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वो भी था जमानाः वोट की खातिर दो बार दरवाजा खटखटाना होता था जरूरी
Sun, 19 Jan 2020 06:27 AM IST
संजीव कुमार झा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Sun, 19 Jan 2020 06:27 AM IST
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विजय कुमार मल्होत्रा
‘वोटर कहते, अच्छा आप चुनाव लड़ रहे हैं। नेताजी एक बार मुझे और याद दिला देना, वोट आपको ही देंगे’। असल में तब न सोशल मीडिया था और न ही सवारी गाड़ी। पैदल ही प्रत्याशी अपना चुनाव प्रचार करने दूर-दूर तक के ग्रामीण इलाकों में पहुंच जाते थे। जिस दरवाजे पर नेताजी दो बार पहुंच जाते थे, उनका वोट पक्का हो जाता था।
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बात आजादी के तीन साल बाद 1950 में दिल्ली डिस्ट्रिक्ट बोर्ड चुनाव की है। बाहरी दिल्ली के जब एक गांव में हम पहुंचे, तो लोगों ने आदर-भाव से पहले तो बिठाया। फिर पूछा क्यों आए हो भइया। जब उन्हें बताया गया कि चुनाव हैं और आपको मुझे ही वोट देना है, तब मतदाताओं का एक ही जवाब होता था। वह कहते कि एक बार तो वोट मांगने आ गए, पता नहीं वोट की तारीख और आपका नाम याद रहे या नहीं, इसलिए एक बार फिर से आना। आपका वोट हमारे पूरे परिवार का पक्का हो जाएगा।
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दूरदराज के इलाके में दो बार पहुंचना उस वक्त काफी मुश्किल होता था, क्योंकि कार आदि का खास इंतजाम था नहीं, लेकिन मतदाता के दरवाजे पर कम से कम दो बार नहीं पहुंचने पर वोट भी नहीं मिलता था। ऐसे में दो बार दरवाजा खटखटाना बेहद ही जरूरी होता था।
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जब तक मतदाता के दरवाजे पर राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशी अपनी पहुंच नहीं बनाते, तब तक मतदाता बूथ तक पहुंचने को तैयार नहीं होते। उस दौरान उम्मीदवारों से गांव-देहात के लोग सिर्फ अपनापन चाहते थे। चुनाव प्रचार में पानी की तरह पैसा बहाने की न जरूरत होती थी और न ही मसल पॉवर दिखाने की। मतदाता सिर्फ प्रत्याशियों के स्वभाव पर भी मतदान करने पहुंच जाते थे।
नोट: दिल्ली में जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में शामिल प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा से अमर उजाला के संवाददाता नवनीत शरण से बातचीत के आधार पर।