विधायकों की गिरफ्तारी हो या जेएनयू मामला, आखिर दिल्ली पुलिस अदालत में क्यों खा जाती है मात
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एक के बाद एक आप विधायकों की गिरफ्तारी में दिल्ली पुलिस की अदालत में असफलता से पुलिस की कार्यप्रणाली पर ही सवाल नहीं उठे बल्कि उसकी छवि भी धूमिल हुई है। यह पहला मौका नहीं है जब पुलिस आप विधायकों को गिरफ्तार करने के बाद उनका पुलिस रिमांड नहीं ले पाई।
दरअसल पुलिस नेताओं को गिरफ्तारी में जल्दबाजी करती है लेकिन अदालत के समक्ष ठोस साक्ष्य पेश करने में असफल रहती है। आप विधायकों के अलावा जेएनयू में नारेबाजी मामले में भी पुलिस अपनी किरकिरी करा चुकी है और दो वर्ष बीतने के बावजूद अभी तक आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र तक दाखिल नहीं कर पाई।
कानून के जानकारों के अनुसार किसी भी गिरफ्तारी के लिए साक्ष्य अहम होते हैं। अदालत में हमेशा साक्ष्यों को देखा जाता है और उसी आधार पर आरोपी का पुलिस रिमांड या फिर न्यायिक हिरासत तय होती है।
पुलिस को अदालत में जिस प्रकार बार-बार असफलता का मुंह देखना पड़ता है उससे उन आरोपों को बल मिलता है कि उसने दबाव में काम किया है। हालांकि पुलिस ने अधिकांश मामलों में तुरंत कार्रवाई करते हुए गिरफ्तारियां की हैं, मगर जितनी जल्दबाजी में गिरफ्तारी की जाती है उतनी जल्दबाजी में साक्ष्यों को एकत्रित करने में पहल नहीं की जाती।
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
मुख्य सचिव अंशु प्रकाश मारपीट मामले में भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने के तुरंत बाद मुख्यमंत्री निवास से सीसीटीवी फुटेज सीज करने के अलावा मुख्यमंत्री के सलाहकार वीके जैन के बयान अदालत में दर्ज कराने के बाद ही पुलिस गिरफ्तारियां करती तो संभवत: उसका केस मजबूत होता है व अदालत के समक्ष साक्ष्य रखे जाते।
मामले में दोनो ही काम पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद किए और अदालत के समक्ष ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर पाई जिससे मजिस्ट्रेट संतुष्ट हो कर रिमांड देते। पहले दिन वीके जैन के जो बयान पेश किए गए अगले दिन उसके उलट बयान बताए गए।
ऐसे में अदालत को कुछ संदेह नजर आया और पुलिस को असफलता हाथ लगी। इससे पूर्व कई विधायकों की जमानत व अग्रिम जमानत पर पुलिस को फटकार लग चुकी है। तिलक नगर के विधायक की अग्रिम जमानत पर तो हाईकोर्ट ने फटकार लगाते हुए यह भी कह दिया था कि आखिर दो माह बीतने के बाद भी क्या साक्ष्य एकत्रित करेंगे। क्यों मामले को राजनीतिक रूप दिया जा रहा है।
इसी प्रकार जेएनयू मामले में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया, उनका रिमांड लिया। जमानत पर सुनवाई के दौरान पुलिस ने स्वयं माना कि उनके पास फिलहाल कोई सबूत नहीं है। यही कारण है कि आरोपी छात्रों को जमानत मिली। पुलिस अति संवेदनशील व देशद्रोह से जुड़े मामले में आज तक आरोपपत्र तक दाखिल नहीं कर पाई।