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बुलंदशहर में प्राण त्यागते तो मिलता ‘अंतिम सम्मान’
अरीश रिज़वी/अमर उजाला, गाजियाबाद
Updated Thu, 05 Feb 2015 01:07 AM IST
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अपनी जवानी जंग-ए-आजादी में गुजारने वाले स्वतंत्रता सेनानी हरप्रसाद बिना गार्ड ऑफ ऑनर के इस दुनिया से विदा हो गए। उन्हें प्रशासन की ओर से अंतिम सम्मान भी नसीब न हो सका।
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गाजियाबाद प्रशासन का तर्क है कि चूंकि उनका पंजीकरण बुलंदशहर जिले में था, ऐसे में हम उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर नहीं दे सकते थे। हालांकि हमने पांच हजार रुपये अपनी श्रद्धांजलि अवश्य दी है।
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स्वतंत्रता सेनानी हरप्रसाद मूलरूप से बुलंदशहर जिले के रझौड़ा गांव के रहने वाले थे। इन दिनों गाजियाबाद के लोहियानगर ए ब्लाक में परिवार के साथ रहते थे। नाती-पौतों का उनका भरा पूरा परिवार है।
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उनके बेटे ब्रह्मपाल हाइड्रिल में एसडीओ थे, जबकि धर्मपाल सिंह का अपना कारोबार है। ब्रह्मपाल के एक पुत्र और चार पुत्रियां हैं। धर्मपाल के चार पुत्र हैं।
हरप्रसाद के पौते ओमेंद्र सिंह और राज चौधरी ने बताया कि उनके दादा 1978 में बुलंदशहर से गाजियाबाद आए थे। उनकी मानें तो उनके दादा को जंग-ए-आजादी के दौरान काला पानी की सजा हुई थी।
वे आजाद हिंद फौज के जवान थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ सिंगापुर और जापान में रहे। वर्ष 1982 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र से नवाजा था।