{"_id":"191e971676db0241fee810eccea6d665","slug":"wheat-gluten-protein-difficulties-giving-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"गेहूं का ग्लूटन प्रोटीन दे रहा परेशानियां ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गेहूं का ग्लूटन प्रोटीन दे रहा परेशानियां
डीपी आर्य/अमर उजाला, गाजियाबाद
Updated Thu, 03 Dec 2015 09:19 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ज्यादा उपज के लिए मनमाने तरीके से रासायनिक खाद इस्तेमाल के गंभीर नतीजे नई-नई बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। इस कड़ी में सिलिएक नामक बीमारी भी शामिल हो गई है।
विज्ञापन
इसमें गेहूं में पाए जाने वाले ग्लूटन प्रोटीन को पचा पाने में लोगों को परेशानी हो रही है। शरीर इसे बैक्टीरिया मानकर रिएक्ट कर रहा है, जिससे लोगों को पेट में अफारा, गैस बनने, डायरिया आदि की समस्या होती है।
विज्ञापन
पहले हजारों में किसी एक को होने वाली यह बीमारी अब 100 में पांच व्यक्तियों में होने लगी है। गाजियाबाद, बुलंदशहर, मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में इसका असर ज्यादा है।
विज्ञापन
साल दर साल इससे पीड़ित रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। रासायनों के साथ ही वातावरण में बदलाव का असर गेहूं पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार अब गेहूं में मिलने वाले ग्लूटन प्रोटीन को पचाने की क्षमता पर असर दिख रहा है। ग्लूटन प्रोटीन आटा गूंथने की प्रक्रिया में मददगार होता है।
सरदार बल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम के वैज्ञानिक डा. एके आहलूवालिया ने बताया कि शोध में पाया गया है कि गेहूं का प्रोटीन स्ट्रक्चर लगातार बिगड़ रहा है। मंडल में इस बीमारी के करीब 15 हजार रोगी हैं। पांच साल पहले इनकी संख्या मात्र 1200 थी।
कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं के इस प्रोटीन में सुधारकर नई प्रजातियों के शोध पर काम शुरू पर्यावरण वैज्ञानिक डा. विवेकराज सिंह के अनुसार जैव प्रौद्योगिकी विभाग गेहूं की ईको फ्रेंडली प्रजातियों पर काम कर रहा है। इनका शोध पूरा हो गया है। जल्द ही इनको किसानों को उगाने के लिए जारी कर दिया जाएगा।
यह होती है परेशानी
फिजीशियन डा. जीवी सिंह के अनुसार कुछ लोगों को सिलीएक में गेहूं का प्रोटीन छोटी आंत में पच नहीं पाता है। इससे लोगों को अपच, उल्टी होने, माइग्रेन, जोड़ों का दर्द, गर्भपात होने, शरीर पर दाने होने, मानसिक रोग और कमजोरी की शिकायत सामने आती है।
बच्चों में इसका ज्यादा ही असर दिखता है। इसलिए गेहूं की बजाय जौ, ज्वार, बाजरा, चने की रोटी खाने की सलाह दी जाती है। बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता और समय के साथ रोगी के शरीर में इस प्रोटीन को पचाने का सामर्थ्य विकसित हो जाता है।