मौसम ने भी बनाया चुनावी मूड, करेगा गजब की करामात
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लोकसभा चुनावी बिगुल बज गया है। दिल्ली समेत एनसीआर और हरियाणा व यूपी की सीटों पर अप्रैल के पहले पखवाड़े में ही मतदान होंगे। इसलिए यहां के प्रत्याशियों को प्रचार में पसीना कम बहाना पड़ेगा।
मौसम वैज्ञानिकों का मनाना है कि चुनावों के दौरान मौसम में कुछ खास परिवर्तन भी होंगे। जिससे चुनावों के दौरान फील्म काम करने वाले कुछ कार्यकर्ता तो बेहद खुश रहेंगे। लेकिन कुछ कार्यकर्ताओं को मौसम की बदमिजाजी झेलनी पड़ेगी।
दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़ में 10 अप्रैल को मतदान होंगे, ऐसे में प्रचार मार्च के बचे हुए दिन और अप्रैल के पहले सप्ताह में होगा। इस वजह से इन्हें गर्मी की तपिश कम झेलनी होगी। इन सीटों पर प्रचार न सिर्फ दिन में आसान होगा बल्कि रात के तापमान में मामूली वृद्धि से प्रत्याशी व समर्थकों का जोश भी कायम रह सकेगा।
इनसे रहेगी नाराजगी
चुनावों के दौरान इन इलाकों में मौसम कहर भी बरपा सकता है। जिससे चुनावों के प्रॉपर काम-काज में कार्यकार्ताओं को काफी समस्याओं से जूझना पड़ सकता है।
यूपी की 33 सीटों के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर की कुछ सीटों पर मतदान मई के पहले पखवाड़े में होंगे। अप्रैल के पहले पखवाड़े में पारा 35 डिग्री के आसपास रहता है तो मई में यह 42-45 डिग्री तक पहुंच जाता है।
चुनाव प्रबंधन से जुड़े नेताओं का कहना है कि मई में जिन सीटों पर चुनाव होंगे, वहां प्रचार का अधिक टाइम मिलेगा, लेकिन तपिश में जोश जरूर ठंडा हो सकता है।
क्या है मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान?
मौसम विभाग के निदेशक बीपी यादव कहते हैं कि अभी से दो महीने बाद की सीधी भविष्यवाणी तो नहीं की जा सकती, लेकिन ट्रेंड पर नजर डाल सकते हैं। मध्य भारत, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र की तरफ से पारा बढ़ना शुरू होता है, जो उत्तर भारत में अप्रैल के पहले पखवाड़े में 35 डिग्री पार कर जाता है तो दूसरे पखवाड़े में पारा 40 डिग्री को छूता है।
मौसम विभाग के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि मई के पहले पखवाड़े में पारा कई बार 42-45 डिग्री तक पहुंचा है। 2010 और 2013 में उत्तर भारत में न सिर्फ 45 डिग्री से ऊपर पारा पहुंचा था बल्कि लू के थपेड़ों ने भी लोगों को खूब परेशान किया था। गत वर्ष उत्तर भारत में लगातार दस दिन पारा 44-46 डिग्री के बीच रहा था।
मौसम विभाग के अनुसार मई के महीने में 2003 से 2013 तक की बात करें तो 2010 में 45.4 डिग्री तक पारा पहुंचा था, जबकि मई महीने में अधिकतम तापमान का रिकार्ड 29 मई, 1944 के नाम 47.2 डिग्री के साथ दर्ज है। अप्रैल में तापमान 2009 में 43.5 डिग्री तक पहुंचा था। अप्रैल के रिकार्ड की बात करें तो 1941 में 45.6 डिग्री तक पारा दर्ज किया गया था।
क्यों हो रहा है ये नाटकीय बदलाव?
भारतीय मौसम में पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) अलग-अलग तरह की भूमिका निभाता है। फरवरी के महीने में सामान्य से अधिक सात बार पश्चिमी विक्षोभ ने मौसम बिगाड़ा और बारिश-ओले-बर्फबारी से ठंडक दी।
मार्च भी अभी तक दो पश्चिमी विक्षोभ आ चुके हैं लेकिन कमजोर थे। अप्रैल और मई में जो पश्चिमी विक्षोभ आते हैं, उससे गर्मी बढ़ती है और लू चलती है। मौसम वैज्ञानिक का कहना है कि अप्रैल व मई जब पश्चिमी विक्षोभ आता है, तो अफगानिस्तान में तापमान 50 डिग्री के आसपास होता है, इसलिए यहां भी साथ में गर्मी लेकर आता है। 2013 में कुछ ऐसा ही हुआ था।
जबकि मौसम वैज्ञानिक एम दुर्रईसामी का कहना है कि एनसीआर समेत उत्तर भारत से अब सर्दी छू मंतर हो रही है। कुछ पश्चिमी विक्षोभ आ भी रहे हैं, लेकिन वे कमजोर हैं। अब धीरे-धीरे गर्मी बढ़ेगी।