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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Unemployment reaches home... a deep impact on the mental health of parents

Delhi NCR News: बेरोजगारी का असर घर तक... माता-पिता की मानसिक सेहत पर गहरा प्रभाव

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 08 Apr 2026 10:24 PM IST
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- अध्ययन में 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 73 हजार से अधिक भारतीयों के डेटा का विश्लेषण किया गया
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- बेरोजगार बच्चों के कारण बुजुर्गों में डिप्रेशन का खतरा 12% तक बढ़ा



अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। देश में बढ़ती बेरोजगारी अब केवल युवाओं तक सीमित समस्या नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर परिवार के बुजुर्गों की मानसिक सेहत पर भी साफ दिखाई देने लगा है। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल एसएसएम पॉपुलेशन हेल्थ जनसंख्या स्वास्थ्य में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि जिन माता-पिता के बच्चे बेरोजगार हैं, उनमें अवसाद (डिप्रेशन) का खतरा अधिक होता है। अध्ययन में 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 73,000 से ज्यादा भारतीयों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। निष्कर्षों के अनुसार, यदि परिवार में कम से कम एक वयस्क संतान बेरोजगार है, तो माता-पिता में डिप्रेशन का जोखिम लगभग 12 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश सागर के अनुसार, भारतीय समाज में पारिवारिक रिश्ते बेहद गहरे होते हैं। माता-पिता अपने बच्चों की सफलता और असफलता को व्यक्तिगत रूप से लेते हैं। ऐसे में जब बच्चा बेरोजगार होता है, तो वे खुद को असफल मानने लगते हैं, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता है।
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शोध में यह भी पाया गया कि बेरोजगार बेटों के मामले में यह प्रभाव अधिक गहरा होता है, खासकर तब जब वह परिवार का बड़ा बेटा हो। सामाजिक अपेक्षाओं के कारण माता-पिता पर भावनात्मक दबाव बढ़ जाता है। डॉक्टरों के अनुसार, यह तनाव हमेशा स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। इसके लक्षणों में लगातार उदासी, चिड़चिड़ापन, थकान, नींद की कमी, भूख में बदलाव, सिरदर्द और शरीर में दर्द शामिल हो सकते हैं। कई बार शर्मिंदगी और आत्मग्लानि के कारण लोग सामाजिक दूरी भी बना लेते हैं।
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सामाजिक संबंध मजबूत होने पर खतरा कम-
हालांकि, अध्ययन में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। जिन लोगों के सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं—जैसे दोस्तों, रिश्तेदारों और समुदाय के साथ जुड़ाव—उनमें डिप्रेशन का खतरा कम पाया गया। यह दर्शाता है कि सामाजिक सहभागिता मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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