इन पर पड़ी उबर की मार, नहीं बचा रोजगार
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राजधानी दिल्ली में युवती से हुए दुष्कर्म के बाद अमेरिकन टैक्सी सर्विस कंपनी उबर पर सरकार के बैन ने उन चालकों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है जो इसके सहारे अपने परिवार को पाल-पोस रहे थे। पूरे मामले में कंपनी की हुई बदनामी के बाद आलम यह हो गया है कि दूसरी टैक्सी सर्विस कंपनियां भी इन्हें नौकरी पर रखने से कतरा रही है।
दूसरे राज्यों से आकर किराये के घर में रह रहे ऐसे हजारों चालकों के लिए अब खाने का भी संकट खड़ा हो गया है। इसे लेकर न तो सरकार गंभीर है न ही कंपनी। इसी परदे के पीछे की कहानी को अमर उजाला संवाददाता कुमार हरिओम ने टटोला तो कुछ ऐसी ही तस्वीर निकलकर सामने आई।
यह घर है उबेर में ही काम करने वाले एक चालक दिनेश का। अपने दो बच्चों और बीवी के साथ किराये के घर में रह दिनेश ने जब उबेर ज्वॉइन की थी तो काफी सपने देखे थे। गाड़ी की किश्त के अलावा बच्चों के बेहतर पालन-पोषण की प्लानिंग की थी। लेकिन कुछ ही महीनों ने सब-कुछ तबाह हो गया।
इनका क्या था कुसूर
बुझे मन से दिनेश ने बताया कि परिवार उत्तराखंड में रहता है न्यूज में खबर देखकर वे भी फोन कर रहे है अब उन्हें किस मन से जवाब दूं। खुद को ही दिलासा दे रहा हूं। लेकिन ये भी कब तक चलेगा? दो साथियों ने बताया कि वे दूसरी कंपनियों में नौकरी के लिए गए थे। लेकिन उबर में काम करने का नाम सुनते ही वो कंपनियां नौकरी देने में पीछे हट गई।
चालक सन्नी की दास्तां-
कुछ ऐसी ही कहानी चालक सन्नी के साथ जुड़ी हुई है। घर परिवार में आर्थिक अर्जन के लिए अकेले होने के चलते उन्होंने उबेर कंपनी को ज्वॉइन किया था। बुढ़े मां-बाप और बीवी और दो बच्चों के साथ परिवार पाल रहे सन्नी के लिए अब रोजी रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है।
सन्नी का कहना है कि दूसरी कंपनियों की तरह यह कंपनी नहीं थी। काफी कॉ-ऑपरेटिव है, लेकिन एक चालक की गलती ने सबके घर तबाह कर दिए। नौकरी जाने से ज्यादा घर में आर्थिक अर्जन का संकट खड़ा हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि क्या करें? किससे मिले? अब वाहे-गुरूजी की ही आस बची है।