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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Treatment for a cleft palate remains unsuccessful even after surgery

Delhi NCR News: मुंह के तलवे में दरार की सर्जरी के बाद भी नहीं सफल होता इलाज...

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 22 Aug 2026 06:43 PM IST
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क्लेफ्ट पैलेट बच्चों की स्पीच थेरेपी में जानकारी की कमी बड़ी बाधा
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एम्स और वीएमएमसी व सफदरजंग अस्पताल के संयुक्त अध्ययन में यह बात सामने आई

सिमरन
नई दिल्ली, 22 अगस्त।
नई दिल्ली। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली और वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज व सफदरजंग अस्पताल के एक संयुक्त अध्ययन में यह बात सामने आई है। जन्म से मुंह और तालू में दरार (क्लेफ्ट पैलेट) वाले बच्चों की सर्जरी के बाद भी स्पीच थेरेपी में जानकारी की कमी बड़ी बाधा बन रही है। अध्ययन के अनुसार, 87.5 फीसदी देखभाल करने वालों को बच्चे के निदान या सर्जरी के बाद पर्याप्त जानकारी नहीं मिली।
यह अध्ययन नवंबर 2023 से जुलाई 2025 के बीच किया गया। इसमें एक टर्शियरी क्लेफ्ट केयर सेंटर के 32 देखभाल करने वालों से बातचीत की गई। इनमें 15 मां और 17 पिता शामिल थे। सभी बच्चे नॉन-सिंड्रोमिक क्लेफ्ट पैलेट से प्रभावित थे। उनकी पैलेट सर्जरी हो चुकी थी। शोधकर्ताओं ने बच्चों की उम्र और परिवार के शहरी या ग्रामीण क्षेत्र में रहने जैसे कारकों पर भी ध्यान दिया। अध्ययन में पाया गया कि जानकारी की कमी स्पीच थेरेपी शुरू करने में बड़ी बाधा बनी। कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में इलाज का खर्च, लंबी दूरी और विशेषज्ञों की कमी भी नियमित थेरेपी से बच्चों को दूर करती है।
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सुधार दिखने पर बढ़ता है भरोसा
अध्ययन का एक सकारात्मक पहलू यह रहा कि बच्चों की बोलने की क्षमता में सुधार दिखने पर माता-पिता का भरोसा बढ़ा। सभी 32 प्रतिभागियों ने माना कि बच्चे की स्पीच में बदलाव देखकर वे थेरेपी जारी रखने के लिए अधिक प्रेरित हुए। एम्स के प्लास्टिक एवं रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विभाग के सुवाशिस दास ने इस पर जोर दिया। उन्होंने कहा, परिवारों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि स्पीच थेरेपी जरूरी है। उन्हें यह भी समझाना होगा कि नियमित थेरेपी से बच्चे को किस तरह और कितने समय में फायदा मिल सकता है।
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चुनौतियां और समाधान
सफदरजंग अस्पताल के बर्न, प्लास्टिक एवं रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विभाग की अर्चना सिन्हा ने सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक रुकावटों को महत्वपूर्ण बताया। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ तक पहुंचना और बार-बार आने-जाने का खर्च बड़ी समस्या है। एम्स दिल्ली के स्पीच एंड लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट अक्षय धीमान ने बताया कि करीब 22 देखभाल करने वालों (68.8 प्रतिशत) ने सामाजिक दबाव और भावनात्मक तनाव का जिक्र किया। शोधकर्ताओं ने निदान के समय ही परिवार को सरल और स्पष्ट जानकारी देने का सुझाव दिया है। साथ ही टेलीथेरेपी और घर पर अभ्यास जैसे मॉडल को उपयोगी बताया है।
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