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इन्हें शौक नहीं मजबूरी में सड़कों पर गुजारते हैं रात
ब्यूरो/ अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Mon, 11 May 2015 12:37 AM IST
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जान जोखिम में डाल कर फुटपाथ पर सोने वाले अधिकतर लोगों की यह मजबूरी है। कोई घर को खर्च भेजने के लिए पैसा बचाना चाहता है तो किसी के पास इतना पैसा ही नहीं है कि वह किराये का घर ले सके। कुछ अपने सामान की रक्षा के लिए सड़क किनारे सोते हैं तो कुछ को खुले में सोने का शौक है। हालांकि प्रशासन रैन बसेरों को खुलवाने की तैयारी कर रहा है।
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रात में बेलगाम दौड़ते चार पहिया वाहनों की परवाह किए बिना सड़क किनारे सोने वाले अधिकतर लोग यह जोखिम मजबूरी में लेते हैं। नीलम-अजरौंदा ओवरब्रिज पर सोने वाले मुकेश ने बताया कि वह बिहार के बेगूसराय जिले से यहां रोजगार ढूंढने आए थे। काम नहीं मिला तो रिक्शा चलाने लगे।
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गांव में माता-पिता सहित परिवार में आठ लोग हैं। उनका पेट पालने के लिए हर महीने छह सात हजार रुपये भेजने पड़ते हैं। बताया कि बहुत मेहनत करने पर दिनभर में ढाई सौ से तीन सौ रुपये कमा पाते हैं। कमरे का किराया बचाने के लिए कभी पुल पर तो कभी किसी पार्क में सो जाते हैं। बताया कि उनके जैसे डेढ़ सौ से अधिक रिक्शा चालक हैं, जो इस तरह रात गुजारते हैं।
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बीपीटीपी चौक के पास नारियल पानी बेचने वाले राजू ने बताया कि उसका घर तो शहर में ही है, लेकिन माल की हिफाजत के लिए नारियल के ढेरों के पास सोना पड़ता है। बाईपास रोड पर पप्पू का मिट्टी के बर्तन घड़े आदि बेचने का काम है। पप्पू का पूरा परिवार सड़क किनारे कतार से लगाकर चारपाई पर सोता है।
उसने बताया कि खुले में सोने की आदत है, दूसरे सड़क किनारे पड़े घड़े बर्तन आदि सामान की रक्षा भी हो जाती है। हनुमान मंदिर के पास रोज रात को सोने वाले 65 वर्षीय राजन ने बताया कि वह परिवार से अलग रहता है। मांग कर खाता-पीता है। कभी-कभी तो आधे या खाली पेट सोना पड़ता है। इतना पैसा ही नहीं मिलता कि किराये पर कमरा ले सकें। इन मजबूरों को प्रशासन और सरकार से ही मदद की आस है।