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मरीज ने लिखा पत्र - पीएम सर! जीवन नरक बना देती है ये बीमारी

Mon, 02 Apr 2018 10:16 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 02 Apr 2018 10:16 AM IST
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The patient wrote letter - PM Sir! this disease made life like a  hell
pm modi

पीएम सर, आजकल देश के कई हजार युवा विकट स्थिति से गुजर रहे हैं। इन्हें एकाइलूसिंग स्पॉन्डिलाइटिस (एस) बीमारी होने की वजह से जीवन नरक बन चुका है। देश में हर साल करीब 20 से 25 हजार युवा इस घातक बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। जिन्हें सरकार के अस्पतालों में भी इलाज नहीं मिल पा रहा। न ही कोई बीमा कंपनी इसके उपचार पर मरीज की आर्थिक सहायता करती है। 

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ये कहना है दिल्ली के मंडावली क्षेत्र निवासी अंकुर का। शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में उन्होंने बताया कि एकाइलूसिंग स्पॉन्डिलाइटिस बीमारी ऑटो इम्यून डिसार्डर की श्रेणी में आती है। आम तौर पर यह रोग 15 से 44 वर्ष के युवाओं को अपना शिकार बनाती है।
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मरीज जोड़ों में भयंकर दर्द और इन्फ्लामेशन का सामना करता पड़ता है और विशेषतौर से उसकी रीढ़ की हड्डी प्रभावित हो जाती है। वहीं समय के साथ शारीरिक संरचना पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। नतीजतन मरीज युवावस्था में ही विकलांगता का शिकार बन बिस्तर पकड़ लेता है।
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उन्होंने पीएम मोदी से अपील की है कि आयुष्मान भारत में इस तरह की बीमारियों को जोड़ हजारों युवा मरीजों के जीवन को बचाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बीमारी से ग्रस्त मरीजों ने सोशल मीडिया और वॉट्सएप पर भी ग्रुप बना रखा है। जहां सभी एकजुट होकर एक दूसरे की मदद करने का प्रयास कर रहे हैं। 
 

बीमारी का उपचार लाखों रुपये में है

The patient wrote letter - PM Sir! this disease made life like a  hell
PM Narendra Modi

अंकुर ने बताया कि देश में इस वक्त कितने मरीज इस खतरनाक बीमारी एस से ग्रस्त हैं। इनकी सटीक जानकारी सरकार के पास उपलब्ध नहीं है। न ही सरकार ने अभी तक इस बीमारी को गंभीर रोगों की सूची में शामिल किया है। जिसकी वजह से मरीज को सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं मिल पाता। प्राइवेट में इस बीमारी का उपचार लाखों रुपये में है। करीब 18 से 20 लाख रुपये का खर्चा आता है। इसलिए उपचार हर किसी के वश में भी नहीं है। 

प्रधानमंत्री कार्यालय में अंडर सेक्रेटरी को भेजे अपने पत्र में अंकुर ने बताया कि वे कई वर्षों से इस बीमारी से ग्रस्त हैं। देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान एम्स से लेकर दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों तक में वे चक्कर काट चुके हैं।

लेकिन हर जगह उन्हें इलाज में लाखों रुपये का खर्च बता दिया जाता है। सरकार से मदद के लिएवे कई बार पत्र भी लिख चुके हैं। लेकिन अब तक बीमारी का बोझ उन पर बना हुआ है। अंकुर का कहना है कि मरीज तो क्या चिकित्सकीय स्तर पर भी कई बार इस बीमारी का खुलासा करने में डॉक्टर चक्कर खा जाते हैं। मरीजों की संख्या लाखों में है, जबकि अस्पतालों में इनका इलाज करने वाले डॉक्टर कुछेक ही हैं। 

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