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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   The first major electoral message of the new youth politics

Delhi NCR News: बदली युवा राजनीति का पहला बड़ा चुनावी संदेश

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 19 Sep 2026 07:53 PM IST
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सड़क पर व्यवस्था से सवाल पूछने वाली जेन-जी डेढ़ महीने बाद कैंपस चुनाव में एबीवीपी के साथ खड़ी नजर आई
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भाजपा ने जंतर-मंतर से सीख लेते हुए परिस्थितियों को बनाया अपने अनुकूल, कांग्रेस अपने अंतर्विरोधों को नहीं कर सकी दूर


अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। बमुश्किल डेढ़ महीने के भीतर दिल्ली में युवा राजनीति की दो तस्वीरें सामने आईं, जो पहली नजर में एक-दूसरे से बिल्कुल उलट दिखती हैं। जुलाई में परीक्षा, शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं ने जंतर-मंतर पर सड़क को अपना मंच बनाया था। तब सवाल व्यवस्था और सत्ता से सीधे पूछे जा रहे थे। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में वही युवा कैंपस की चुनावी राजनीति का हिस्सा बने तो राजनीतिक अभिव्यक्ति का रुख बदलता दिखा। चेहरे और सोशल मीडिया की भूमिका भले समान रहे, लेकिन राजनीतिक मंच अलग था।
राजनीतिक विश्लेषक इस बदलाव को भाजपा नेतृत्व की उस रणनीति से जोड़कर देखते हैं, जिसमें बदलती सामाजिक परिस्थितियों और नई पीढ़ी के मुद्दों को जल्दी पहचानकर उसके अनुरूप राजनीतिक संवाद तैयार किया जाता है। जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान उठे सवालों को सत्ता के शीर्ष स्तर तक पहुंचने और युवाओं के साथ संवाद की जरूरत पर जोर दिए जाने के बाद भाजपा और सरकार के बयानों व कार्यक्रमों में जेन-जी को संबोधित करने की कोशिश लगातार दिखाई दी। डूसू चुनाव को इसी बदले संवाद की संस्थागत परीक्षा के तौर पर भी देखा गया। चुनाव परिणाम में एबीवीपी ने अध्यक्ष, सचिव और सहसचिव के तीन प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की।
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एनएसयूआई के तीन बागी मैदान में
कांग्रेस और एनएसयूआई जंतर-मंतर के बाद बने माहौल को चुनावी स्तर पर अपने पक्ष में नहीं बदल सके। टिकट वितरण को लेकर एनएसयूआई में असंतोष सामने आया और तीन बागी उम्मीदवार मैदान में उतरे। इनमें से एक ने उपाध्यक्ष पद जीत लिया। नतीजतन डूसू में एनएसयूआई का प्रदर्शन इस बार शून्य पर रहा, जबकि उपाध्यक्ष पद बागी उम्मीदवार के खाते में गया।
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सीख लेकर बदली रणनीति
मेरे लिए जंतर-मंतर आंदोलन और डूसू चुनाव को साथ रखकर देखने पर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस संगठन ने कितनी सीटें जीतीं। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सड़क से उठी नई पीढ़ी की आवाज को किसने कितनी जल्दी पढ़ा और अपनी राजनीति में जगह दी। भाजपा-एबीवीपी की कामयाबी को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। सड़क पर नई परिस्थिति पैदा हुई तो शीर्ष नेतृत्व ने उससे सीखते हुए अपनी रणनीति बदली। एबीवीपी ने मजबूत संगठन, वैचारिक आधार, अनुशासन और मुद्दों पर स्पष्टता के साथ खुद को बदली परिस्थितियों के अनुरूप ढाला और उसका परिणाम चुनावी जीत के रूप में सामने आया।

- प्रो. चंद्रचूड़ सिंह, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
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