'अगर कोशिश की होती तो गांव में नहीं फैलता मातम'
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अटाली निवास इशाक खान नंबरदार के सिर पर पट्टी बंधी ही हुई है। उनके सिर की चोट का जख्म तो अहिस्ता-अहिस्ता भर रहा है। मगर उनके दिल का घाव हरा बना हुआ है।
वो कहते हैं उनके गांव को किसी की नजर लग गई है और अब शरारती तत्व उनके इलाके में मनमानी कर रहे हैं। चार सौ सालों से हम सब यहां आपस में प्यार मोहब्बत से रहते आ रहे हैं।
कभी कोई तकरार नहीं हुई। पता नहीं, किसकी नजर लग गई। इसी गांव के जाकिर हुसैन कहते हैं कि जिस वक्त गांव में तनाव बढ़ रहा था वहां थाने के प्रभारी भी मौजूद थे, जो वहां से फोर्स को लेकर चलते बने और गांव उपद्रवियों के हवाले हो गया।
'इससे पहले कुछ नहीं हुआ इस गांव को किसी की नजर लग गई'
ग्रामीण रणवीर तेवतिया ने कहते हैं कि गांव के विकास में अल्पसंख्यकों का योगदान है। ये मेहनतकश लोग हैं। लेकिन ‘राजनीति’ ने भाईचारे को निगल लिया।
सरजीत बताते है कि गांव में धार्मिक स्थल का तनाव पहले नहीं था। सभी लोग प्यार से रहते थे। झगड़े के पीछे पंचायत चुनाव की रणनीति भी है।
पांच साल पहले भी जब पंचायत चुनाव हुए थे तो इस स्थल को लेकर खूब राजनीति हुई। लेकिन बात इतनी नहीं बढ़ी थी। गांव अटाली में लोगों का गुस्सा धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है।
उस दिन लगा गांव में नहीं है प्रशासन
इसीलिए सप्ताह भर पहले हुई आगजनी व पथराव के पीछे की मंशा पर मंथन हो रहा है। लोगों ने एक बात साफ कर दी है कि तनाव को रोका जा सकता था, अगर प्रशासन ने वक्त पर सख्ती की होती।
लेकिन इस दिन लगा कि गांव में कोई प्रशासन नहीं था। ग्रामीणों का कहना है कि सियासी लोगों ने पंचायत चुनाव के मद्देनजर गांव को बांटना चाहा।
दो समुदायों में शक और नफरत भरे। लेकिन समझदारों की कोशिश से अब तनाव धीरे-धीरे कम हो रहा है। गले-शिकवे मिट रहे हैं। तीन दिन से दोनों पक्षों को बैठाकर पंचायत चल रही है। दोनों समुदायों के लोग एक दूसरे के साथ बैठकर बातें कर रहे हैं।