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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और 6 राज्यों को से पूछा, क्यों न गौरक्षकों को बैन कर दिया जाए

Sat, 08 Apr 2017 10:01 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 08 Apr 2017 10:01 AM IST
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supreme court seeks reply from Centre and 6 states in cow vigilantes issue
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

गाय की तस्करी करने के संदेह पर अलवर में गौरक्षकों द्वारा एक मुस्लिम व्यक्ति की कथित तौर पर हत्या करने की घटना के करीब एक हफ्ते बाद सुप्रीम कोर्ट ने गौरक्षक समूहों पर पाबंदी लगाने की गुहार संबंधी याचिका पर केंद्र सरकार और राजस्थान व उत्तर प्रदेश सहित छह राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। सभी को तीन हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है। 

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न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने गौरक्षक समूहों पर पांबदी लगाने की गुहार संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों का पक्ष जानना जरूरी है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और झारखंड सरकार को नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई तीन मई को होगी।
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याचिकाकर्ता तहसीन पूनावाला की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगडे ने पीठ के समक्ष अलवर की घटना का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस मामले में तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। ऐसा लगता है कि कई राज्यों में गौरक्षक समूह पर लगाम नहीं है, जिस कारण उपद्रव व हिंसक घटनाएं हो रही हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं और कुछ राज्यों में यह समस्या बेहद विकट हो गई है। अलवर की घटना इसका जीता-जागता उदाहरण है। 

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गौरक्षा के नाम पर कानून को अपने हाथ में ना लें

supreme court seeks reply from Centre and 6 states in cow vigilantes issue
supreme court

याचिका में कहा गया है कि गौशाला में गाय की मौत और गौरक्षा के नाम पर गौरक्षक कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं। याचिका में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, और कर्नाटक के उस कानून को असंवैधानिक करार देने की गुहार की गई है, जिसमें गाय की रक्षा के लिए निगरानी समूहों के पंजीकरण का प्रावधान है। 

याचिका में कहा गया कि गौरक्षा निगरानी समूह कानून के दायरे से बाहर जाकर काम कर रहे हैं। गौरक्षा के नाम पर गौरक्षक अत्याचार कर रहे हैं और उनके द्वारा किए जाने वाले अपराध न केवल भारतीय दंड संहिता के दायरे में हैं बल्कि एससी/एसटी एक्ट, 1989 के दायरे में भी है। 

याचिका में ‘सलवा जूदूम’ (नक्सल विरोधी समूह) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2011 में दिए उस फैसले का हवाला दिया गया है जिसमें सलवा जूदूम पर पाबंदी लगाई गई थी। याचिका में कहा गया कि कानून के तहत मिले संरक्षण की वजह से ऐसे लोग हिंसा भड़काने का काम करते हैं और अल्पसंख्यकों और दलितों पर अत्याचार करते हैं। 

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