इस हंसी में छुपे हैं कई गम, दर्दभरी है इसकी कहानी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गरीब से गरीब को बेशक तकनीकी शिक्षा की वकालत कर रहे हैं। लेकिन अभी भी गरीबी का बोझ मेधावी बच्चों की काबिलियत पर हावी है। बड़े संस्थानों की भारी-भरकम फीस इन्हें तकनीकी शिक्षा से दूर कर रही है।
कृष्णा हेंब्रान को ही देखिए। कई तकनीकी संस्थानों की प्रवेश परीक्षा पास कर चुका कृष्णा जंतर मंतर से दाखिले की फीस जुटाने की जंग लड़ रहा है। मूलत: उड़ीसा के आदिवासी परिवार में जन्मे कृष्णा ने 2009 में राज्य बोर्ड से इंटर किया।
इसी साल उसने एनआईटी की प्रवेश परीक्षा दी। राउरकेला स्थित एनआईटी में कर्ज लेकर दाखिला भी लिया। लेकिन स्कॉलरशिप का पैसा कर्ज में चला जाता था। ऐसे में उसे दो साल में पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बाद कृष्णा ने 2011 में नेशनल काउंसिल फॉर होटल मैनेजमेंट एंड कैटरिंग टेक्नोलॉजी (एनसीएचएमसीटी) की प्रवेश परीक्षा दी।
जंतर मंतर पर आसमान तले जमाया आशियाना
पूसा इंस्टीट्यूट में उसे दाखिला मिला। किसी तरह पहला सेमेस्टर पूरा किया। लेकिन दूसरे सेमेस्टर में फीस का इंतजाम नहीं हो सका। लिहाजा उसे संस्थान छोड़ना पड़ा। कृष्णा ने इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी। 2013 में जेईई (मुख्य) व एनईईटी का एंट्रेंस भी पास किया।
लेकिन तकनीकी वजहों से कृष्णा का दाखिला दोनों जगहों पर नहीं हो सका। कृष्णा फिलहाल जंतर मंतर को आशियाना बनाकर पूसा में दाखिले की फीस का जुगाड़ कर रहा है। सर्द मौसम में थोड़ा पैसा सुबह और दोपहर का पेपर बेचने से मिलता है। जबकि पेट गुरुद्वारे की लंगर से भरता है।
कृष्णा के मुताबिक, दूसरे सेमेस्टर में दाखिले के लिए 45,000 रुपये की फीस का जुगाड़ कर रहा हूं। इस बार दाखिला मिल जाए तो पढ़ाई के अलावा सुबह-शाम काम करके पैसे जमा कर लूंगा। इससे आगे दिक्कत नहीं आएगी। बात करते-करते कृष्णा की आंखे नम हो गईं। लेकिन हिम्मत अभी भी उसकी बरकरार है।
नहीं मिला सियासी मुलाकातों का फायदा
कृष्णा के मुताबिक, तीन भाई-बहनों में वह सबसे बड़ा है। पढ़ने की ललक देखकर पिता योगेंद्र हेंब्रान ने अपना पैतृक कइसी गांव छोड़ दिया। वह कटक के कल्याणी नगर में आ गए। यहां लंबे समय तक मजदूरी करके पढ़ाया।
फिलहाल वह सुरक्षा गार्ड के तौर पर काम कर रहे हैं। लेकिन कमाई इतनी नहीं होती कि पूरा परिवार पालकर हमारी पढ़ाई की फीस दे सकें। कृष्णा ने बताया कि एनआईटी डायरेक्टर, सीबीएसई चेयरमैन से मुलाकात की। इसके बाद उड़ीसा के राज्यपाल व मुख्यमंत्री से भी मिला। लेकिन खास फायदा नहीं मिला। इसके बाद दिल्ली आ गया।
यहां मोतीलाल बोरा, भक्तचरण दास समेत दूसरे कई नेताओं से मुलाकात की। लेकिन अभी तक दाखिले की फीस का जुगाड़ नहीं हो सका है। दूसरे सेमेस्टर में दाखिले का अभी भी समय है। अगर फीस मिल जाती तो काम हो जाता।