फब्तियों से परेशान हो छोड़ा गांव, बनीं नेशनल चैंपियन
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जब इन्होंने शुरूआत की तो पड़ोसियों ने उनके पिता पर फब्तियां कसी और रिस्तदारों ने उनका मजाक उड़ाया। सबने बस यही कहा कि लड़की से कोई ऐसे काम कराता है भला।
पिता प्राइवेट नौकरी करते थे ऐसे में इस मासूम लड़की के लिए तय कर पाना मुश्किल था कि पढ़ाई कर जल्द से जल्द नौकरी पाए या अपना पसंदीदा पेशा चुने।
इस मौके पर नीतू के पिता ने उसका साथ दिया और परिवार सहित उत्तराखंड से दिल्ली आ गए। यहां आते ही नीतू को खेल की नई संभावनाओं का पता चला।
दिल्ली में ही उसकी मुलाकात भूपेंद्र धवन और दिनेश असवाल से हुई। इन दोनों ने नीतू को सलाह दी कि जिस खेल में वह अभी अपनी मेहनत लगा रही है वह उसके लिए सही नहीं है।
मैडल जीतने पर ही मिलते हैं पैसे
नीतू ने इन दोनों गुरूओं की सलाह को गंभीरत से लिया और दौड़ने के अपने शौक को छोड़ना ही सही समझा। अपने गुरूओं के कहने पर नीतू ने पावर लिफ्टिंग में अपना कैरियर बनाने का निर्णय लिया। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था।
पावर लिफ्टिंग या वेट लिफ्टिंग को कैरियर बनाने में महीने का कम से कम 15000 से 20000 रुपये का खर्चा था। पिता प्राइवेट नौकरी करते थे। बेटी के शौक को पूरा करने के साथ उन्हें घर भी चलाना था।
ऐसे में नीतू के सामने खेल के लिए जरूरी संसाधन जुटाना बड़ी चुनौती थी। नीतू के पिता का इस बारे में कहना है कि हमारे देश में खिलाड़ी के मैडल जीतने पर तो उसे लाखों के ईनाम दिए जाते हैं लेकिन, जब वह संघर्ष कर रहा होता है तो उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आता।
आज कई खिताब हैं इनके नाम
परिस्थितीयां बेहद मुश्किल थीं लेकिन नीतू के पिता आनंद बदौली ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी बेटी के सपने को पूरा करने के लिए उसे पूरा समर्थन देने का फैसला किया।
नीतू ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी। नीतू आज पावर लिफ्टिंग चैंपियन हैं। वह इंडियन ओपन इंटरनेशनल पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप जीत चुकी हैं। इसके अलावा नेशनल ओपेन बेंच प्रेस चैंपियनशिप और दिल्ली स्टेट पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप का खिताब भी उनके नाम है।
इस मुकाम पर पहुंच कर नीतू को एहसास होता है कि अगर उनके लोगों और रिश्तेदारों के विरोध के बाद भी वह इस मुकाम तक पहुंच चुकी क्योंकि उनके मां-बाप ने उनका पूरा समर्थन किया। नीतू की यह कहानी लड़का-लड़की में भेद करने वालों के मुंह पर करारा जवाब है।
साभार: एचटी मीडिया