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कोरोना काल के एक योद्धा की आपबीतीः अंतिम विदाई से डर लगता है, लेकिन हैं तो ‘अपने’

Sat, 06 Jun 2020 04:45 AM IST
दुष्यंत शर्मा परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 06 Jun 2020 04:45 AM IST
सार

  • कोविड संक्रमित और संदिग्ध शवों को सुपुर्द-ए-खाक कराने वाले योद्धा की आपबीती
  • शव के पास जाने से रोकते हैं तो अभद्रता पर उतर आते हैं लोग, परिवार भी दहशतजदा
  • डर के कारण कई मृतकों के परिजन नहीं जाते कब्रिस्तान

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story of a warrior of the Corona period in delhi
कब्रिस्तान में मो. शमीम (बाएं ) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सर! यदि सभी लोग शवों के अंतिम संस्कार से इनकार कर देंगे तो कैसे चलेगा? कोई तो उनकी अंतिम विदाई करेगा। आखिरकार हैं तो वह अपने ही ना...बस, यही बात सोचकर सारी परेशानी भूल जाता हूं और कोविड शवों का अंतिम संस्कार करा रहा हूं। अब तो हर दिन 8 से 10 शव अंतिम संस्कार के लिए लाए जा रहे हैं। हर पल मन में डर रहता है कि कहीं संपर्क में आने से कोरोना संक्रमण न हो जाए। इसके एवज में मुझे 100 रुपये मिलते हैं। 

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‘अमर उजाला’ संवाददाता से बातचीत में ये कहना है कोविड संक्रमित और संदिग्ध शवों के अंतिम संस्कार कराने वाले मोहम्मद शमीम का। दिल्ली में कोरोना का पहला मरीज 2 मार्च को सामने आया था, लेकिन कोरोना से पहली मौत आरएमएल अस्पताल में 14 मार्च को हुई थी। इसके बाद से आईटीओ स्थित कब्रिस्तान में हर दिन कोविड प्रबंधन के तहत अंतिम संस्कार के लिए शव पहुंचने लगे। यहां पांच एकड़ जमीन भी आरक्षित की गई है, जहां 200 से ज्यादा शव दफनाए जा चुके हैं। नियमानुसार कोविड से जुड़े शवों से परिजनों को दूर रखा जाए, लेकिन अंतिम संस्कार कराने वालों के लिए यह किसी पहाड़ जितनी चुनौती से कम नहीं है। 
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शमीम बताते हैं, साहब! लोगों का कुछ पूछो ना तो ही अच्छा है। उनसे कहो कि भैया दूर रहो, कोविड बॉडी से दूर रहने में ही भलाई है तो मारपीट और गाली-गलौज पर उतर आते हैं। दो सप्ताह पहले ही कई लोग अंतिम संस्कार के दूसरे दिन उन्हें मारने के लिए कब्रिस्तान जा पहुंचे थे। ऐसे में शमीम के परिजन भी डर और खामोशी से भरे हैं। क्योंकि, परिवार में इसके अलावा रोजी-रोटी का कोई दूसरा जरिया नहीं है।
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तीन महीने से बच्चों को नहीं लगाया गले
संक्रमण की आशंका के चलते मोहम्मद शमीम भी कोरोना योद्धा से कम नहीं है। वे दिन में 16 घंटे तक अपने घर में नहीं घुसते हैं। तीन महीने से उन्होंने अपने बच्चों को गले नहीं लगाया है और न ही उनके साथ खाना खाया। यह सब इसलिए, क्योंकि शमीम हर बार इंसानियत का हवाला देकर अपने काम को एक कर्तव्य के रूप में देखते हैं। 

कई मृतकों के परिजन नहीं जाते कब्रिस्तान
शमीम का कहना है कि काफी शव लावारिस आते हैं, लेकिन कुछ मृतकों के परिजन भी होते हैं तो वह कब्रिस्तान नहीं जाना चाहते। क्योंकि, उन्हें संक्रमण से डर लग सकता है। इसके बाद सभी शवों को सुपुर्द-ए-खाक कराने की जिम्मेदारी शमीम पर ही होती है।


सरकार से उम्मीद जरूर
शमीम कहते हैं कि वे भी कोरोना योद्धा हैं। सरकार को उनके लिए भी बीमा सुरक्षा देनी चाहिए, ताकि उनके बच्चों की मदद हो सके। हालांकि, ये अपील तो कब्रिस्तान आते-जाते हर उस शख्स से कर रहे हैं जिसे देख उन्हें लगता है कि सरकार तक वह उनकी बात को पहुंचा सकता है।

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