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Delhi: प्रदूषण-शहरीकरण की मार से बंजर होती जा रही दिल्ली-NCR की मिट्टी, IISWC की रिपोर्ट ने दिखाई भयावह तस्वीर
Tue, 26 Aug 2025 05:54 AM IST
विजय पुंडीर
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: विजय पुंडीर
Updated Tue, 26 Aug 2025 05:54 AM IST
सार
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ सॉइल एंड वॉटर कंजर्वेशन (आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि कई जिलों की जमीन की उर्वरता और गुणवत्ता मान्य स्तर से नीचे गिर चुकी है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : freepik
विस्तार
दिल्ली-एनसीआर की मिट्टी लगातार प्रदूषण और शहरीकरण की मार झेलते हुए बंजर होती जा रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ सॉइल एंड वॉटर कंजर्वेशन (आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि कई जिलों की जमीन की उर्वरता और गुणवत्ता मान्य स्तर से नीचे गिर चुकी है।
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विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि हालात नहीं सुधरे तो अगले 10 से 15 वर्षों में क्षेत्र का बड़ा हिस्सा कृषि योग्य नहीं रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार गाजियाबाद के औद्योगिक इलाकों की मिट्टी में शीशा 180 मिलीग्राम प्रति किलो पाया गया, जबकि सुरक्षित सीमा 50 मिलीग्राम है। मिट्टी का जैविक कार्बन कंटेंट पिछले 15 वर्षों में 0.75 से घटकर 0.45% पर आ गया है। आईआईएसडब्ल्यूसी के सर्वे में फरीदाबाद की मिट्टी में आर्सेनिक का स्तर मानक सीमा (0.01) से आठ गुना ज्यादा 0.08 मिलीग्राम प्रति लीटर पाया गया है। यहां मिट्टी की नमी क्षमता 2005 से 2023 के बीच 25% घट चुकी है। इसी तरह गुरुग्राम शहरीकरण ने मिट्टी की संरचना बिगाड़ दी है। यहां की 40% जमीन माडरेटली डिग्रेडेड कैटेगरी में आ चुकी है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कंस्ट्रक्शन वेस्ट और ठोस कचरे के दबाव से 2010 की तुलना में 2024 में मिट्टी के उर्वरता सूचकांक (सॉइल फर्टिलिटी इंडेक्स) में 30% की गिरावट दर्ज हुई।
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अब लगभग 30 फीसदी जमीन ही खेती योग्य
केंद्रीय भू-जल बोर्ड, राष्ट्रीय भूमि उपयोग व भूमि आवरण आकलन (एनबीएसएस एंड एलयूपी, नागपुर) तथा आईआईएसडब्ल्यूसी (देहरादून) की संयुक्त रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर की कुल भूमि का 27 से 30% ही खेती योग्य बचा है। 1990 के दशक की शुरुआत में यह 45% था। यानी पिछले तीन दशकों में खेती योग्य भूमि में औसतन 15 से 18% की गिरावट आई है। इस दाैरान उर्वरता भी लगातार घटी है। मिट्टी की प्राकृतिक उत्पादकता में लगभग 40% तक गिरावट दर्ज की गई है।
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इसके लिए जिम्मेदार कारण
औद्योगिक अपशिष्ट : गाजियाबाद और बल्लभगढ़ से निकलने वाले 60% से अधिक उद्योगों का अपशिष्ट बिना उपचार के सीधे जमीन व नालों में जाता है।
निर्माण मलबा : दिल्ली एनसीआर में हर साल करीब 2 करोड़ टन कंस्ट्रक्शन और डिमोलिशन वेस्ट निकलता है, जिसका 40% से अधिक बिना प्रोसेसिंग के खुले में डंप होता है।
रासायनिक उर्वरक : रिपोर्ट में आईसीएआर के हवाले से कहा गया है कि प्रति हेक्टेयर औसतन 260 किलोग्राम नाइट्रोजन-आधारित खाद का प्रयोग हो रहा है, जो राष्ट्रीय औसत से 40% अधिक है।
कचरा डंपिंग : भलस्वा, गाजीपुर लैंडफिल से निकलने वाले लीचेट ने आसपास की मिट्टी व भूजल को भारी धातुओं से 2 से 3 गुना तक प्रदूषित कर दिया है।
आईआईएसडब्ल्यूसी का अनुमान है कि सुधार के प्रयास नहीं किए गए तो 2035 तक एनसीआर के 40% क्षेत्र में पारंपरिक खेती असंभव हो जाएगी और गेहूं-धान का उत्पादन 25 से 30% तक घट जाएगा।
उपाय न किए गए तो एनसीआर का बड़ा हिस्सा 2050 तक बंजर भूमि में बदल सकता है और खाद्य सुरक्षा आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है