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‘बीमार’ है भलस्वा लेक! सरकारी ‘दवा’ चाहिए
Tue, 27 Aug 2019 06:45 AM IST
दुष्यंत शर्मा
सर्वेश कुमार, नई दिल्ली
सर्वेश कुमार, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Tue, 27 Aug 2019 06:45 AM IST
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भलस्वा लेक
- फोटो : अमर उजाला
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कभी वाटर स्पोर्ट्स के लिए मशहूर भलस्वा लेक फिलहाल अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही है। हालात जल्द नहीं बदले तो 34 वर्ग हेक्टेयर में मौजूद इस झील के अस्तित्व पर खतरा मंडरा जाएगा।
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यहां बोटिंग के लिए पहुंचने वाले सैलानियों के साथ वाटर स्पोर्ट्स की प्रैक्टिस करने वाले और सैर करने वाले लोग भी झील की तरह बीमार हो जाएंगे। हैरत की बात यह है कि लेक में भलस्वा डेयरी से निकलने वाला गंदा पानी भी सीवर लाइन के जरिये प्रदूषण का जहर घोल रहा है।
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प्रदूषण और बदबू की वजह से डेढ़ साल तक इस झील पर बोटिंग बंद कर दी गई थी, लेकिन अब दोबारा शुरू कर दिया गया है।
चौंकाने वाली बात यह है कि लेक में प्रतिदिन हजारों लीटर गंदा पानी, गोबर और प्लास्टिक पहुंच रहा है। लेक से महज चंद कदम की दूरी पर भलस्वा डेयरी भी है, जबकि रास्ते का गंदा पानी भी सीवर के जरिए इसी झील में पहुंच रहा है।
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इसकी वजह से बोटिंग या आसपास की सड़क पर सैर करने वालों को दुर्गंध से जूझना पड़ता है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लेक में कार्यरत कर्मी भी अधिक देर तक वहां खड़े नहीं रह सकते हैं।
लेक के इंचार्ज एनएल मीणा ने बताया कि हाल ही में एक ऑयल कंपनी ने सीएसआर गतिविधि के तहत झील की सफाई की, लेकिन झील में मिलने वाले सीवर के पानी पर अंकुश कौन लगाएगा? इस बारे में उन्होंने कहा कि इसके लिए पीडब्ल्यूडी और दिल्ली जल बोर्ड की तरफ से प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने भी माना कि यहां लंबे समय तक ठहरना या पानी के संपर्क में आने वालों को किसी भी तरह की परेशानी होने का खतरा है। इस संबंध में विभागीय अधिकारियों को अवगत करा दिया गया है। इस समस्या को लोकसभा में सांसद हंसराज हंस भी उठा चुके हैं और इसे दूर करने की कवायद चल रही है।
प्रदूषित झील में दी जा रही है ट्रेनिंग
1992 में लेक का शुभारंभ किया गया। इसके बाद यहां केयाकिंग और कनोइंग चैंपियनशिप भी हुई। दिल्ली कनोइंग और केयाकिंग एसोसिएशन के विक्रम पॉल बताते हैं अभी कुछ बच्चों को वाटर स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग दी जा रही है। झील का प्रदूषण खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि यदि प्रैक्टिस के दौरान खिलाड़ी किसी बीमारी का शिकार हो गया तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? लेक में बढ़ते प्रदूषण के कारण इसे डेढ़ साल से भी अधिक वक्त के लिए बंद कर दिया गया था। इस दौरान वर्ष 2018 में एक बार स्पोर्ट्स गतिविधियों के आयोजन के लिए सरकार से इजाजत मांगी गई, जिसे प्रदूषण की वजह से मना कर दिया गया था।
विभाग एक-दूसरे पर थोप रहे जिम्मेदारी
लेक के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण ने पर्यटन विभाग को जमीन दी थी। हालांकि, इसमें एम्यूजमेंट पार्क भी तैयार किया जाना था, जिसकी योजना अधर में लटक गई। सीवर और लेक के पानी से संबंधित समस्याओं के लिए पीडब्ल्यूडी, दिल्ली जल बोर्ड की जिम्मेवारी है, परंतु सभी विभागों ने एक-दूसरे की जिम्मेदारी बताकर पल्ला झाड़ लिया है।
जलीय जीवों के अस्तित्व पर भी खतरा
लेक में भी पहले साइबेरिया से प्रवासी पक्षी सहित कई और जीव-जंतु रहते थे। प्रदूषण के कारण उनकी तादाद अब ना के बराबर रह गई है। लेक के इर्द-गिर्द कॉलोनियों से निकलने वाले गंदा पानी को यदि झील में डालने और कूड़ा फेंकने का सिलसिला नहीं थमा तो जलीय जीवों का अस्तित्व मिट जाएगा।
चल रहे हैं प्रयास
पर्यटन विभाग के प्रवक्ता सुधीर शोभती का कहना है कि यहां आने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए संबंधित विभागों से बातचीत की जा रही है। पीडब्ल्यूडी की ओर से यहां सीवर लाइन को दुरुस्त किया जा रहा है, ताकि इसमें गंदा पानी या गोबर आदि ना जाए। इसके लिए अन्य योजना भी बनाई जा रही है।
विभाग एक-दूसरे पर थोप रहे जिम्मेदारी
लेक के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण ने पर्यटन विभाग को जमीन दी थी। हालांकि, इसमें एम्यूजमेंट पार्क भी तैयार किया जाना था, जिसकी योजना अधर में लटक गई। सीवर और लेक के पानी से संबंधित समस्याओं के लिए पीडब्ल्यूडी, दिल्ली जल बोर्ड की जिम्मेवारी है, परंतु सभी विभागों ने एक-दूसरे की जिम्मेदारी बताकर पल्ला झाड़ लिया है।
जलीय जीवों के अस्तित्व पर भी खतरा
लेक में भी पहले साइबेरिया से प्रवासी पक्षी सहित कई और जीव-जंतु रहते थे। प्रदूषण के कारण उनकी तादाद अब ना के बराबर रह गई है। लेक के इर्द-गिर्द कॉलोनियों से निकलने वाले गंदा पानी को यदि झील में डालने और कूड़ा फेंकने का सिलसिला नहीं थमा तो जलीय जीवों का अस्तित्व मिट जाएगा।
चल रहे हैं प्रयास
पर्यटन विभाग के प्रवक्ता सुधीर शोभती का कहना है कि यहां आने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए संबंधित विभागों से बातचीत की जा रही है। पीडब्ल्यूडी की ओर से यहां सीवर लाइन को दुरुस्त किया जा रहा है, ताकि इसमें गंदा पानी या गोबर आदि ना जाए। इसके लिए अन्य योजना भी बनाई जा रही है।