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शाहबेरी हादसा: 3 साल से फाइलों में दफन रहा बिल्डिंग बायलॉज, बढ़ती गई हाई-रिस्क इमारतें

Sat, 21 Jul 2018 10:23 AM IST
योगेश शर्मा, अमर उजाला, नोएडा
योगेश शर्मा, अमर उजाला, नोएडा Updated Sat, 21 Jul 2018 10:23 AM IST
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shahberi building collapse, building bio lodge ignore from 3 years illegal construction continue

शाहबेरी में जमींदोज हुई इमारतों ने सिस्टम की लापरवाही की परतें खोलनी शुरू कर दी हैं। गांवों में नियमों को ताक पर रख खड़ी की जा रही इमारतें कभी भी हादसे का सबब बन सकती हैं, इस बात का अंदाजा होते हुए भी नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी अवैध निर्माण को बढ़ावा देते रहे। बिल्डिंग बायलॉज तो बने, लेकिन इसे तीन साल तक फाइलों में दफन रखा गया। अब शुक्रवार को इसकी सार्वजनिक सूचना प्राधिकरण ने जारी कर दी है।

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अप्रैल 2015 में दिल्ली-एनसीआर को हिलाकर रख देने वाले भूकंप के झटकों ने ग्रामीण इलाकों में बनी इमारतों पर सवाल खड़े कर दिए थे। यमुना और हिंडन के किनारे खड़े हो रहे बेतरतीब कंक्रीट के जंगल कभी भी धराशायी हो सकते हैं, इसको ध्यान में रख नोएडा के अंतर्गत आने वाले करीब 80 गांवों के लिए बिल्डिंग बायलॉज तैयार किया गया। ग्रामीण आबादी के अंतर्गत भूमि पर नोएडा भवन विनियमावली तैयार हो चुकी थी, लेकिन इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई जिसका फायदा किसानों से भूखंड खरीदकर अवैध तरीके से फ्लैट तैयार करने वाले सिंडिकेट ने जमकर उठाया।
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भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से इन तीन साल में ग्रामीण आबादी में बनी इस तरह की हाई रिस्क इमारतों की तादाद लगातार बढ़ती गई और सस्ते आशियाने के लालच में लोग फंसते गए। अब जब शाहबेरी हादसे की गाज ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों पर गिरी है तो तीन साल से सरकारी फाइलों में धूल फांक रही भवन नियमावली की याद नोएडा प्राधिकरण को आई है।

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दोहरा रवैया आखिर क्यों

ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट: नोएडा प्राधिकरण बिल्डर को जमीन आवंटित करता है। बिल्डर लेआउट प्लान और बिल्डिंग प्लान जमा कराता है। ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट के तहत बिल्डर को निर्माण सामग्री की गुणवत्ता से संबंधित शपथपत्र जमा कराना होता है। प्रोजेक्ट के निर्माण के दौरान कभी भी प्राधिकरण अधिकारी प्रोजेक्ट का निरीक्षण कर सकते हैं। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही एनओसी जारी की जाती है।

गांव के बिल्डर फ्लैट: बिल्डर छोटे भूखंड खरीदकर नोएडा प्राधिकरण से बिना अनुमति लिए निर्माण कार्य शुरू कर देते हैं। अधिकांश ऐसे प्रोजेक्ट विशेषज्ञों की सलाह लिए बिना बनाए जाते हैं। बिल्डिंग तैयार होने के बाद डीलरों के जरिये फ्लैट बुक कराए जाते हैं। डील होने पर रजिस्ट्री करा ली जाती है।

गांवों की भवन नियमावली का प्रारूप
- नोएडा प्राधिकरण की अनुमति के बिना बिल्डर, कॉलोनाइजर नहीं कर सकते प्रोजेक्ट लांच।
- आपात स्थिति से निपटने के लिए भवन सेट बैक और साइड बैक जगह छोड़ने का प्रावधान है।
- 15 मीटर से ऊंची इमारत के निर्माण के लिए नोएडा प्राधिकरण से अनुमति लेना अनिवार्य।
- भवन निर्माण से पहले नक्शा पास कराने और बाद में कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने का नियम।
- नक्शे में भवन की लंबाई-चौड़ाई और ऊंचाई के हिसाब से वाहन पार्किंग का भी प्रावधान है।

लापरवाही उजागर करते ये सवाल

1: नोएडा में भवन नियमावली 2016 को दो साल तक क्यों रखा गया फाइलों में छुपाकर।
2: ग्रेनो में नियमावली लागू थी तो फिर नियमों को ताक पर रख कैसे खड़ी हुई इमारतें।
3: अधिसूचित क्षेत्र की सरकारी जमीनों पर आखिर किसी शह पर हो गए अवैध निर्माण।
4: बिल्डिंग बायलॉज बनाया गया तो फ्लैटों की रजिस्ट्री के समय क्यों नहीं हुई निगरानी।
5: बिल्डर और बैंकों के गठजोड़ में कहीं प्राधिकरण के भी अफसर भी तो नहीं शामिल।

रंजन तोमर, अध्यक्ष-नोएडा विलेज रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने बताया कि, इस तरह की इमारतें गांव की आबादी में नहीं बनाई जा रही हैं, बल्कि खेती की जमीन खरीदकर बिल्डर प्रोजेक्ट बना रहे हैं। प्राधिकरण की यदि नियमावली है तो इसके बाद भी नियमों को ताक पर क्यों रखा जा रहा है। शाहबेरी जैसी घटना के लिए सीधे तौर पर बिल्डर और प्राधिकरण जिम्मेदार हैं।

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