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दोषसिद्धि के लिए जांच और अभियोजन के तरीकों में हो सुधार: जस्टिस चेल्लमेश्वर

Sun, 16 Apr 2017 08:35 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद Updated Sun, 16 Apr 2017 08:35 PM IST
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SC Justice Chellameshwar joins seminar in manav rachna university
न्यायमूर्ति चेल्लमेश्वर - फोटो : अमर उजाला
देश में दोषसिद्धि की दर बहुत कम है, इसकी पहली वजह मामलों की कमजोर, घटिया या खराब जांच है और दूसरी अभियोजन की गिरती हुई गुणवत्ता है। पुलिस राजनैतिक, सामाजिक दबाव में काम करने को मजबूर है तो लोक अभियोजकों की नियुक्ति सत्तापक्ष से उनकी नजदीकी की काबिलियत तय करती है।
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ऐसी हालत में दोषसिद्धि की दर कम होना स्वाभाविक है। यदि सभी संस्थाएं, पुलिस, अभियोजन और न्यायालय ईमानदारी से कर्तव्य को अंजाम दें तो बदलाव की गुंजाइश है। उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति चेल्लमेश्वर ने यह बात आपराधिक जांच और अभियोजन विषय पर मानव रचना यूनिवर्सिटी में रविवार को आयोजित कार्यशाला में कही।
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पुलिस आयुक्त डॉ. हनीफ कुरैशी, सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड दिव्यकांत लाहौटी और एडवोकेट शशांक गर्ग के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कार्यशाला का आरंभ करते हुए जस्टिस चेल्लमेश्वर ने कहा कि समय आ गया है कि पुलिस विभाग में कार्यों का बंटवारा किया जाए।
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एक पुलिस अधिकारी केस की जांच के साथ सुरक्षा, सामान्य ड्यूटी, वीआईपी ड्यूटी आदि काम भी संभालता है इससे जांच प्रभावित तो होती है समय भी बर्बाद होता है। जांच अधिकारियों से अन्य काम नहीं लिए जाएं तो हालात बदल सकते हैं। कहा कि अधिकतर लोक अभियोजक सिर्फ वेतन का चेक लेने ही कार्यालय आते हैं, यह परंपरा खत्म होनी चाहिए।

डीजीपी हरियाणा केपी सिंह ने बदलते आपराधिक परिदृष्य के साथ ही वैज्ञानिक जांच पद्धति पर जोर दिया। बताया कि पारंपरिक अपराध के आंकड़े ठीक तीस साल पहले ही जितने हैं लेकिन साइबर अपराध, महिलाओं से संबंधित अपराध प्रतिवर्ष दो से पांच गुना रफ्तार से बढ़ रहे हैं।

इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया समय की मांग है। दोषसिद्धि की कम दर की वजह उन्होंने गवाहों का मुकर जाना भी बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य झूठ बोल सकता है लेकिन मशीन नहीं, इसलिए जांच को अधिक वैज्ञानिक ढंग से करने और उसे अदालत में मान्यता दिलाने की जरूरत बताई।

अपराधी की पहचान के लिए आधार कार्ड के आंकड़े पुलिस को उपलब्ध कराए जाने पर भी उन्होंने जोर दिया। मद्रास हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने भी आधुनिक और वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया, ट्रेंड पुलिस अफसर की तैनाती पर जोर दिया। कार्यशाला में विभिन्न राज्यों से आए विषयों के विशेषज्ञ, डेलिगेट्स, पुलिस अधिकारी और जांच अधिकारी, वकील और लॉ विद्यार्थी मौजूद रहे।  

इन विशेषज्ञों ने रखे अपने विचार
कार्यशाला में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस एके मित्तल, जस्टिस राजन गुप्ता, जस्टिस राजेश बिंदल, दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सीस्तानी, जस्टिस जेआर मिधा, जस्टिस संगीता धींगड़ा सहगल, अजय चौधरी उपराज्यपाल दिल्ली के ओएसडी, दीपिका सूरी, ने भी संबोधित किया।  


इन विषयों पर हुई चर्चा
कार्यशाला में रोल आफ कोर्ट एंड डयूटीज आफ पुलिस आफिसर, फाइनेंशियल फ्रॉड, साइबर क्राइम्स, प्रिवेंशन ऑफ मनी लांडरिंग एक्ट 2002, प्रिजन रिफॉर्म के फीचर, किशोर न्याय 2015, भ्रष्टाचार निरोधक कानून, अपराध जांच और अभियोजन में फोरेंसिक साइंस का महत्व विषयों पर भी विशेषज्ञों ने अपनी राय रखी।


 
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