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निगम को रोज चाहिए एक करोड़, स्मार्ट सिटी के लिए बजट भी चुनौती
भोला पांडेय/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Mon, 27 Jun 2016 04:40 PM IST
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प्रदेश की सबसे पुराना नगर निगम इन दिनों बदहाली से जूझ रहा है। एक महीने के वेतन आदि का खर्च पूरा हो नहीं पाता कि अगले महीने का भार फिर आ जाता है। ऐसे में निगम अधिकारी से लेकर कर्मचारी सब परेशान हैं। पैसों की व्यवस्था हो कहां से इसके लिए अधिकारियों में माथापच्ची हो रही है।
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आपको यकीन नहीं होगा कि निगम कर्मचारियों की लापरवाही के चलते निगम के आय और व्यय में 50 फीसदी का अंतर पैदा हो गया है। ऐसे में स्मार्ट सिटी के लिए 1600 करोड़ रुपये जुटाना निगम के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
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ज्ञात हो कि नगर निगम के तीनों जोन में स्थायी, डेलीवेज और आउट सोर्सिंग के 7000 के करीब कर्मचारी कार्यरत हैं। इनके वेतन और रिटायर्ड कर्मचारियों के पेंशन आदि पर हर महीने करीब 16 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ती है।
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इसके अलावा बिजली बिल 8 करोड़, अधिकारियों व अन्य वाहनों के पेट्रोल व डीजल पर एक करोड़ तथा अन्य खर्च पर करीब 4 करोड़ रुपये खर्च होते हैं।
वेतन की भी कमाई नहीं कर पाता निगम
स्मार्ट सिटी
यानी सिर्फ निगम को चलाने के लिए हर महीने 29 करोड़ रुपये चाहिए। इस हिसाब से नगरनिगम को चलाने के लिए रोज एक करोड़ रुपये की जरूरत है। निगम पर 570 करोड़ रुपये की देनदारी भी है। जिसे अदा करना मुश्किल लग रहा है।
वेतन की भी कमाई नहीं कर पाता निगम:
निगमथ के आंकड़ों पर नजर डालें तो वेतन और पेंशन पर हर महीने 16 करोड़ रुपये खर्च होते हैं और नगर निगम हर महीने केवल 14 करोड़ रुपये ही कमा पाता है। यानी दो करोड़ रुपये का निगम को अलग से जुगाड़ करना पड़ता है।
जानकारों का कहना है कि ये समस्या सरकार और निगम कर्मचारी दोनों के कारण पैदा हुई है। कराधान विभाग ने कभी टैक्स वसूली को गंभीरता से नहीं लिया। न ही आय के साधन खोजने की कोशिश की गई।
प्लानिंग विभाग भी कम जिम्मेदार नहीं:
नगव निगम का प्लानिंग विभाग पूरी तरह से नाकारा साबित हो रहा है। यही कारण है कि अभी तक न तो पार्किंग पॉलिसी बन पाई और न ही स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी पर कोई काम हो पाया।
विज्ञापन पॉलिसी का भी बुरा हाल है। निगम अपनी जमीन तक नहीं बेच पा रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि निगम का प्लानिंग विभाग पार्किंग पॉलिसी, स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी और विज्ञापन पॉलिसी पर ईमानदारी से काम करना शुरू कर दे तो काफी हद तक निगम की वित्तीय समस्या खत्म हो जाएगी। ये तीनों पॉलिसियां वर्षों से लटकी हुई हैं।
वेतन की भी कमाई नहीं कर पाता निगम:
निगमथ के आंकड़ों पर नजर डालें तो वेतन और पेंशन पर हर महीने 16 करोड़ रुपये खर्च होते हैं और नगर निगम हर महीने केवल 14 करोड़ रुपये ही कमा पाता है। यानी दो करोड़ रुपये का निगम को अलग से जुगाड़ करना पड़ता है।
जानकारों का कहना है कि ये समस्या सरकार और निगम कर्मचारी दोनों के कारण पैदा हुई है। कराधान विभाग ने कभी टैक्स वसूली को गंभीरता से नहीं लिया। न ही आय के साधन खोजने की कोशिश की गई।
प्लानिंग विभाग भी कम जिम्मेदार नहीं:
नगव निगम का प्लानिंग विभाग पूरी तरह से नाकारा साबित हो रहा है। यही कारण है कि अभी तक न तो पार्किंग पॉलिसी बन पाई और न ही स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी पर कोई काम हो पाया।
विज्ञापन पॉलिसी का भी बुरा हाल है। निगम अपनी जमीन तक नहीं बेच पा रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि निगम का प्लानिंग विभाग पार्किंग पॉलिसी, स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी और विज्ञापन पॉलिसी पर ईमानदारी से काम करना शुरू कर दे तो काफी हद तक निगम की वित्तीय समस्या खत्म हो जाएगी। ये तीनों पॉलिसियां वर्षों से लटकी हुई हैं।