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मौत नहीं, जिंदगी चुनें: 40 से अधिक स्पीड में बढ़ जाता है रीढ़ की हड्डी टूटने का खतरा, जानें विशेषज्ञों की राय

Tue, 05 Sep 2023 08:03 AM IST
श्याम जी. अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: श्याम जी. Updated Tue, 05 Sep 2023 08:03 AM IST
सार

एम्स विशेषज्ञों का मानना है कि वाहन की चाल धीमी होने से चोट लगने की सूरत में शरीर का फैट व मांसपेशियां झटके को बर्दाश्त कर लेती हैं। इसका असर सीधे हड्डी तक नहीं पहुंच जाता है। 

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risk of spinal fracture increases at speeds above 40 delhi
रीढ़ की हड्डी - फोटो : istock

विस्तार

अगर आप 60 किमी या इससे ऊपर की रफ्तार से अपनी गाड़ी चलाते हैं तो आपकी रीढ़ की हड्डी टूटने का खतरा बढ़ जाता है। 40 की रफ्तार सुरिक्षत मानी जाती है। एम्स विशेषज्ञों का मानना है कि वाहन की चाल धीमी होने से चोट लगने की सूरत में शरीर का फैट व मांसपेशियां झटके को बर्दाश्त कर लेती हैं। इसका असर सीधे हड्डी तक नहीं पहुंच जाता है। जबकि वाहन तेज होने पर चोट का असर सीधे रीढ़ की हड्डी पर पड़ता है। यही नहीं, दुर्घटना से घायल व्यक्ति को गलत तरीके से उठाने व ले जाने सें इनकंप्लीट स्पाइन इंजरी भी कंप्लीट इंजरी में बदल जाती है। इसमें खतरा ताउम्र दिव्यांग होने का रहता है।
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गाड़ी तेज चलाने से बढ़ जाता है 85 फीसदी खतरा
विशेषज्ञों ने इसके लिए बीते साल विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन का भी हवाला दिया है। इसमें पाया गया कि गाड़ी को जितनी तेज चलाते हैं उतना ही ज्यादा रीढ़ की हड्डी में चोट या मौत होने की आशंका बढ़ जाती है। 65 किमी की रफ्तार से चल रहे दो वाहनों में अगर आमने-सामने की टक्कर होती है तो दोनों की मौत का जोखिम 85 फीसदी तक बढ़ जाता है। 
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40 की स्पीड सुरक्षित
वहीं, 40 किमी या इससे कम रफ्तार से चल रहे वाहनों में मौत की आशंका बेहद कम होती है। एम्स में पीएमआर विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. संजय वधवा के मुताबिक, आंकड़े बताते हैं कि रीढ़ की हड्डी को अगर सुरक्षित रखना है तो वाहन धीमी गति से चलाना चाहिए। रफ्तार बढ़ने के क्रम में खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। 40 किमी प्रति घंटा की चाल सुरक्षित है। इससे आगे जाने से वाहन चालक को बचना चाहिए।
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हर साल जुड़ जाते हैं 22 हजार मरीज
देश में हर साल रीढ़ की हड्डी में चोट के मरीजों की संख्या 20 से 22 हजार बढ़ रही है। इन मरीजों में सबसे ज्यादा संख्या वाहनों से चोटिल होने वालों की है। इसके बाद ऊंचाई से गिरने वाले मरीज व अन्य कारणों से रीढ़ की हड्डी में चोट लगने वाले मरीज हैं। देशभर के अस्पतालों में आने वाले मरीजों के आंकड़े बताते हैं कि सड़क दुर्घटना में घायल हुए मरीजों के पीछे तेज गाड़ी चलाना, गाड़ी में सीट बेल्ट न पहनना, फोन पर बात करना, शराब पीकर गाड़ी चलाना मुख्य कारण है।

25 साल में बदला ग्राफ
रीढ़ की हड्डी में चोट लगने के मामलों में पिछले 25 सालों में काफी बदलाव आया है। पहले 70 फीसदी मामले ग्रामीण क्षेत्रों से ऊंचाई से गिरने के आते थे। वहीं, 30 फीसदी वाहनों से दुर्घटना के थे। जबकि अब ग्रामीण क्षेत्र से 55 फीसदी ऊंचाई से गिरने की और सड़क दुर्घटना के मामले 45 फीसदी तक पहुंच गए हैं। वहीं, शहरी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा मामले दुर्घटना में घायल होने वालों का है।

20 से 35 के मरीज ज्यादा
रीढ़ की हड्डी में चोट के मरीजों में सबसे ज्यादा मामले 20 से 35 साल की उम्र में मिलते हैं। इनमें पुरुषों की संख्या ज्यादा होती है। पिछले कुछ सालों में महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है।

तीन टी महत्वपूर्ण
रीढ़ की हड्डी में चोट के लिए तीन टी बड़े कारण हैं। इनमें पहला ट्रामा हैं। इसमें सड़क दुर्घटना और ऊंचाई से गिरना शामिल हैं। इनकी रोकथाम की जा सकती है। वहीं, दूसरा कारण ट्यूबरक्लोसिस है। इससे भी बचाव भी संभव है। वहीं तीसरा कारण ट्यूमर है और इससे बचाव संभव नहीं है।


रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण
1. सड़क दुर्घटना
2. प्राकृतिक आपदा
3. तैराकी की लापरवाही
4. घुड़सवारी

समय पर उपचार से सही हो सकते हैं मरीज
डॉ. संजय वधवा ने बताया कि समय पर उपचार से मरीज ठीक हो सकता है। एम्स में रीढ़ की हड्डी में चोट के मरीजों के लिए पांच बेड आरक्षित हैं। यहां मरीजों को चार से छह सप्ताह के लिए भर्ती किया जाता है। इस दौरान शारीरिक चिकित्सा एवं पुनर्वास की पूरी प्रकिया दी जाती है। चोट के बाद भी मरीज पूरी जिंदगी सामान्य रूप से जी सकता है।
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