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सूचना का अधिकार बना लोगों की जान का दुश्मन
मनोज कुमार/अमर उजाला, ग्रेटर नोएडा
Updated Sat, 03 May 2014 09:53 AM IST
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ग्रेटर नोएडा में सच की तलाश आरटीआई एक्टिविस्टों को मौत की मंजिल तक पहुंचा रही है। ऐसी कई घटनाएं सामने हैं, जिनमें सूचना मांगने वाले या तो मार दिए गए या फिर हमलों में बाल-बाल बचे। ऐसे कई और एक्टिविस्ट हैं, जो निशाने पर हैं।
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अब आरटीआई एक्टिविस्ट चंद्रमोहन की मौत भी सवालों के घेरे में है। अगर परिजनों का आरोप सच साबित होता है, तो चंद्रमोहन वो दूसरे शख्स होंगे... जिन्हें सच की तलाश ने मौत तक पहुंचा दिया।
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साल 2010 में आरटीआई एक्टिविस्ट और व्यापारी नेता विनोद गोयल की हत्या कर दी गई थी। साल 2012 में दनकौर के अछैजा गांव में एक आरटीआई एक्टिविस्ट सलीमुद्दीन सोलंकी ने स्कूल के बारे में जानकारी मांगी तो उसके साथ मारपीट की गई।
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सलीमुद्दीन को आरटीआई वापस लेने को कहा गया और ऐसा न करने पर जान से मारने की धमकी भी दी गई। सलीमुद्दीन ने इसकी शिकायत भी पुलिस में की। एक और वाकया 14 दिसंबर 2013 में सामने आया। दनकौर के सक्का गांव निवासी अनूप सिंह का बदमाशों ने अपहरण कर लिया।
तीन दिन तक अनूप को दिल दहला देने वाली यातनाएं दी गईं और बाद में बदमाश उन्हें मरा समझकर बुलंदशहर के जहांगीरपुरा में फेंक गए। अनूप बच गए, लेकिन उन पर जो गुजरी... वो अब तक स्याह याद के रूप में उनके जेहन पर चस्पा है।
अनूप ने एक ठेकेदार के काम को लेकर सूचना मांगी थी और शायद ये बात ही बदमाशों को नागवार गुजरी। इस बीच आरटीआई एक्टिविस्ट चंद्रमोहन की मौत को भी परिवार वाले हादसा मानने से इनकार कर रहे हैं। एक जमीन को बचाने की कोशिश कर रहे चंद्रमोहन पर हमले हो चुके थे। उन्हें धमकियां मिलीं थीं और पुलिस में भी इसकी शिकायत की गई। इस मामले में ऐसे कई सवाल हैं, जिन्हें जवाब की तलाश है।
जरूरी हैं इन सवालों के जवाब
-चंद्रमोहन ने 30 अप्रैल को थाने में तहरीर देकर जान को खतरा बताया था, उस मामले में पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
-चंद्रमोहन होंडा सीएल कंपनी से रात करीब 11:10 पर गेट से निकले थे और मात्र दो किलोमीटर दूरी को 56 मिनट कैसे लग गए?
-पुलिस को किस व्यक्ति ने कार में आग लगने की सूचना दी? सूचना मिली तो शख्स का रिकॉर्ड पुलिस के पास क्यों नहीं है?
- कार में आग लगने की सूचना के दौरान व्यक्ति ने एक ओप्ट्रा कार और उसका नंबर बताया था?