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Delhi NCR News: युवाओं और गैर-धूम्रपान करने वालों में भी बढ़ रही सांस की परेशानी
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विश्व फेफड़ा दिवस: दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता वायु प्रदूषण भी सांस की समस्याओं को बढ़ा सकता है
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां अब केवल बुजुर्गों या धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं हैं। युवाओं और धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों में भी सांस से जुड़ी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। विश्व फेफड़ा दिवस पर विशेषज्ञों ने फेफड़ों की सेहत को लेकर सतर्क रहने और सांस संबंधी लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करने की अपील की है।
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता वायु प्रदूषण भी सांस की समस्याओं को बढ़ा सकता है। धूल और धुएं के संपर्क में रहने वाले लोगों को भी सावधानी बरतनी चाहिए। मॉडल टाउन स्थित एक निजी अस्पताल के पल्मोनोलॉजी विभाग के उपाध्यक्ष व एचओडी डॉ. इंदर मोहन चुघ के अनुसार, पल्मोनोलॉजी ओपीडी में आने वाले करीब 80 प्रतिशत मरीज सीओपीडी और ब्रोंकियल अस्थमा से संबंधित होते हैं। इनमें पुरुषों की संख्या करीब 60 प्रतिशत और महिलाओं की 40 प्रतिशत है। अलग-अलग बीमारियों में यह अनुपात बदल सकता है।
डॉ. चुघ ने बताया कि लगातार खांसी, सांस फूलना, सांस लेते समय घरघराहट, बार-बार श्वसन संक्रमण और एलर्जी फेफड़ों से जुड़ी आम समस्याओं के लक्षण हैं। लंबे समय से चलने वाली सांस की बीमारियां 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा देखने को मिलती हैं, लेकिन बच्चे, युवा, बुजुर्ग और धूम्रपान करने वाले भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। डॉ. चुघ ने कहा कि फेफड़ों की देखभाल किसी एक उम्र तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सांस से जुड़ी परेशानी को सामान्य समझकर टालने के बजाय समय पर जांच और इलाज कराना जरूरी है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां अब केवल बुजुर्गों या धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं हैं। युवाओं और धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों में भी सांस से जुड़ी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। विश्व फेफड़ा दिवस पर विशेषज्ञों ने फेफड़ों की सेहत को लेकर सतर्क रहने और सांस संबंधी लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करने की अपील की है।
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता वायु प्रदूषण भी सांस की समस्याओं को बढ़ा सकता है। धूल और धुएं के संपर्क में रहने वाले लोगों को भी सावधानी बरतनी चाहिए। मॉडल टाउन स्थित एक निजी अस्पताल के पल्मोनोलॉजी विभाग के उपाध्यक्ष व एचओडी डॉ. इंदर मोहन चुघ के अनुसार, पल्मोनोलॉजी ओपीडी में आने वाले करीब 80 प्रतिशत मरीज सीओपीडी और ब्रोंकियल अस्थमा से संबंधित होते हैं। इनमें पुरुषों की संख्या करीब 60 प्रतिशत और महिलाओं की 40 प्रतिशत है। अलग-अलग बीमारियों में यह अनुपात बदल सकता है।
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डॉ. चुघ ने बताया कि लगातार खांसी, सांस फूलना, सांस लेते समय घरघराहट, बार-बार श्वसन संक्रमण और एलर्जी फेफड़ों से जुड़ी आम समस्याओं के लक्षण हैं। लंबे समय से चलने वाली सांस की बीमारियां 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा देखने को मिलती हैं, लेकिन बच्चे, युवा, बुजुर्ग और धूम्रपान करने वाले भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। डॉ. चुघ ने कहा कि फेफड़ों की देखभाल किसी एक उम्र तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सांस से जुड़ी परेशानी को सामान्य समझकर टालने के बजाय समय पर जांच और इलाज कराना जरूरी है।
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