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एयरफोर्स स्टेशन : रजिस्ट्री करा बनाए हैं मकान तो अवैध निर्माण कैसे
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Mon, 27 Mar 2017 02:32 PM IST
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एसरफोर्स स्टेशन के पास बने मकान
- फोटो : अमर उजाला
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फरीदाबाद में लोग एयरफोर्स स्टेशन के पास 50-60 साल पहले से मकान बनवाकर रह रहे हैं। मकानों की रजिस्ट्री भी है। नगर निगम को विकास शुल्क और प्रॉपर्टी टैक्स दे रहे हैं। लोग बिजली कनेक्शन लेकर बिलों का भुगतान कर रहे हैं तो अवैध निर्माण कैसे हो गया। नगर निगम और जिला प्रशासन के अधिकारी हाईकोर्ट को गुमराह कर रहे हैं। हकीकत कोर्ट से छुपाई जा रही है। ये कहना है एयरफोर्स स्टेशन के पास बसे स्थानीय लोगों का।
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सुंदर कॉलोनी निवासी रिटायर्ड कैप्टन एसएस चौधरी, मनोहर मसीन, डबुआ कॉलोनी निवासी रमेश कुमार, जवाहर कॉलोनी निवासी जितेंद्र कुमार आदि ने सवाल उठाते हुए कहा कि वह पिछले 40-50 साल से यहां मकान बनाकर रह रहे हैं। कई अन्य परिवारों की तो एक पीढ़ी बीत चुकी है। ऐसे में उन्हें कैसे हटाया जा सकता है। उनका कहना है कि एयरफोर्स के चारों ओर बने अधिकांश मकानों की रजिस्ट्री हुई है।
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लोग निगम को प्रॉपर्टी टैक्स दे रहे हैं। बिजली का कनेक्शन ले रखा है। फिर उसे अवैध निर्माण कैसे कहा जा सकता है। कैप्टन चौधरी ने बताया कि रक्षामंत्री रहे जार्ज फर्नांडीस के कार्यकाल के दौरान भी ये मुद्दा उनके सामने उठा था। उन्होंने रक्षा मंत्रालय से ऐसी कोई कार्रवाई न करने का आदेश दिया था जिससे आम जनता प्रभावित हो।
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बता दें कि एयरफोर्स स्टेशन के चारों ओर सुंदर कॉलोनी एक से चार तक, जवाहर कॉलोनी खंड बी, गाजीपुर, डबुआ कॉलोनी, उड़िया कॉलोनी आदि कॉलोनियां बसी हैं। जानकारों की मानें तो स्टेशन के चारों ओर 100 मीटर के दायरे में 25000 से अधिक मकान बने हैं।
आज यहां की आबादी सवा से दो लाख तक पहुंच गई है। यही नहीं स्टेशन के मुख्य द्वार के सामने तक गैस एजेंसियां, छोटी छोटी फैक्ट्रियां भी चल रही हैं। स्टेशन के आसपास लोगों ने 50 गज से लेकर 250 गज तक के दो-तीन मंजिला इमारत बना रखी है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में किराएदार भी रहते हैं। ऐसे में हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना डीसी और नगर निगम प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा। इस बाबत जिला उपायुक्त समीर पाल सरो से संपर्क करने का प्रयास किया गया लेकिन उनका मोबाइल बंद था।
मुआवजा दिए बगैर बस्ती हटाना नहीं होगा संभव
नगर निगम के पूर्व वरिष्ठ योजनाकार रवि सिंगला ने बताया कि वर्ष 2012 में निगम की ओर से उन्होंने एक शपथ पत्र हाईकोर्ट को दिया था जिसमें वस्तु स्थिति के बारे में जानकारी दी गई थी। उसी आधार पर हाईकोर्ट ने इसका दायरा कम कर 100 मीटर कर दिया था। उनका कहना है कि जिस तरह से स्टेशन के चारों ओर घनी आबादी बस चुकी है ऐसे में वहां न तो तोड़फोड़ की जा सकती है और न ही उन्हें जबरन हटाया जा सकता है। उनका ये भी कहना है कि बगैर उचित मुआवजा दिए उन्हें हटाना भी संभव नहीं होगा।
तोड़फोड़ हुई तो जा सकती है जान
स्थानीय लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यदि प्रशासन ने कोई तोड़फोड़ की कार्रवाई की तो लोग विरोध करेंगे। हो सकता है कि इस कार्रवाई से बवाल हो जाए। ऐसे में लोगों की जान भी जा सकती है। उनका कहना था कि लेागों ने अपने जीवनभर की कमाई किसी तरह से जुटा कर एक छत तैयार की है, तो उसे कैसे तोड़ने दें। स्टेशन के चारों ओर इतनी घनी आबादी है कि तोड़फोड़ करना तो दूर सोचा भी नहीं जा सकता है।
कैसे तय करेंगे मुआवजा:
-कैप्टन चौधरी, मुरारीलाल, आशीष कुमार, मनोहर मसीन आदि का कहना है कि बगैर उचित मुआवजा मिले यहां से छोड़कर जाना नामुमकिन है। बड़ी बात ये है कि सरकार लोगों का मुआवजा किस आधार पर तय करेगी। ये भी एक बड़ी चुनौती है। क्योंकि यदि सरकार लोगों को शिफ्ट भी करना चाहेगी तो उसे वर्तमान कलेक्टर रेट की दर से मकान की कीमत लगाकर मुआवजा देना होगा। ये विकल्प भी इतना आसान नहीं है।
हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी अभी नहीं आई है और न ही इस बारे में अभी कोई जानकारी है। कॉपी आने के बाद उसका अध्ययन किया जाएगा उसके बाद ही कुछ कह पाना संभव होगा।-मुकेश सोलंकी, संयुक्त आयुक्त नगर निगम