कोटा तो दे देंगे, कैसे जाचेंगे लिंग?
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दिल्ली के निजी स्कूलों में ट्रांसजेंडर बच्चों को अब कोटे के तहत दाखिला मिलेगा। 9 अक्टूबर को अलाभकारी समूह में शामिल हो जाने के बाद अब ऐसे बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी के तहत दाखिला पा सकते हैं।
बता दें कि सरकारी नियम के अनुसार प्राइवेट स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए 25 प्रतिशत कोटे का प्रावधान है। लेकिन इस फैसले के बाद इसके खिलाफ विरोध के स्वर उठने शुरू हो गए हैं।
इस कोटे के विरोध में आवाज उठाने वाले लोगों की दलील है कि ट्रांसजेंडर बच्चों को इस कोटे की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसे बच्चों के लिए दाखिला पाना कभी मुश्किल बात रही ही नहीं है।
इस कोटे के विरोधी कहते हैं कि ऐसे बच्चों के लिए दाखिला बड़ा मुद्दा नहीं है। चिंता का मुख्य कारण तो ऐसे बच्चों और अन्य बच्चों में अंतर पाए जाने के बाद इन बच्चों को जिस अपमान का सामना करना पड़ता है, वह है।
बहुत बाद में चलता है ट्रांसजेंडर होने का पता
ट्रांसजेंडर बच्चों के एडमिशन में रिजर्वेशन के विरोधी दलील देते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह कोटा दाखिले के समय ही दे दिया जाता है, जबकि उस समय तो यह पता भी नहीं होता कि बच्चे ट्रांसजेंडर हैं भी या नहीं।
नेशनल कोलिशन फॉर पीपल लीविंग विद एड्स की फिरोज खान कहती हैं कि ट्रांसजेडर की आबादी बहुत कम है। ऐसे अधिकतर बच्चे या तो नर या नारी के जननांगों के साथ पैदा होते हैं। इनके लिंग की पहचान भी इनके माता-पिता के आधार पर होती है।
सोसायटी फॉर पीपल्स अवेयरनेस के अंजन जोशी बताते हैं कि ये तो बहुत ही बाद में निश्चित होता है कि वो ट्रांसजेंडर हैं या नहीं। कई बार तो इस बात का पता तब चलता है जब वह खुद अपने शरीर के अंगों के हिसाब से खुद को अनुकूल या सहज नहीं पाते हैं। तब तक तो इनमें से अधिकतर शिक्षा के अधिकार और 25% फ्री सीट के दायरे से ही बाहर हो चुके होते हैं।
प्रताड़ित किए जाने से ऐसे बच्चे छोड़ देते हैं स्कूल
सरोज खान का कहना है कि ऐसे बच्चे अधिकारिक रूप से अलग नहीं किए जाते बल्कि बुरी तरह शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किए जाते हैं। ऐसे बच्चों को कोई सहारा नहीं देता, यहां तक कि उनका परिवार भी उनका साथ छोड़ देता है।
25 वर्षीय टीना बताती है कि जब क्लास 6 में थी तब उसे उत्तरी दिल्ली स्थित उसके ब्वॉयज गवर्नमेंट स्कूल से निकाल दिया गया था। जब उसने अध्यापकों से बात की तो वह भी उसे ही डांटने लगे और भगा दिया।
दसवीं क्लास के बाद स्कूल छोड़ देने वाली 24 वर्षीय शगुन ने अपने कुछ किशोर चेले-चपाटे बना रखे हैं। इनमें 16 बच्चे तीमारपुर से हैं। शगुन बताती है कि इन बच्चों को नियमित रूप से पीटा जाता है, यहां तक कि इन पर ब्लेड से भी वार किए जाते हैं।
आप बीती बताते हुए शगुन कहती है कि वो बाकी लोगों से अलग है इस बात का एहसास उसे तीसरी या चौथी क्लास में ही हो गया था। उसके क्लास के लड़के उसपर बहुत हंसते थे और फबतियां भी कसते थे। उसने 9वीं में अपना स्कूल बदलकर सरकारी स्कूल में दाखिला ले लिया पर वहां भी वैसा ही माहौल था।
अंजन जोशी कहते हैं कि एससी/एसटी वालों पर होने वाले अत्याचारों के लिए कानून है। वैसे ही कानून की जरूरत उन व्यक्तियों के लिए भी है, जो जेंडर नॉर्म्स पूरी तरह मानते। जोशी का कहना है कि जब तक हम समाज को सुरक्षित नहीं बनाएंगे तब तक इस प्रकार के रिजर्वेशन बच्चों के किसी काम के नहीं हैं।