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पापा छोड़ दो ये सब: आपकी ये बुरी लत कर सकती है आने वाली पीढ़ी खराब, AIIMS के डॉक्टरों के शोध में खुलासा

Fri, 19 May 2023 09:56 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Fri, 19 May 2023 09:56 PM IST
सार

प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा ने आंखों के कैंसर से पीड़ित 75 बच्चों में बीमारियों के कारणों का पता लगाने के लिए जेनेटिक अध्ययन किया है। 

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Research by AIIMS doctors revealed father bad lifestyle can cause cancer in children
एम्स के डॉक्टरों का चौंकाने वाला खुलासा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

धूम्रपान-नशा करना व तनाव लेना न केवल शरीर को खराब कर रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी खराब कर रहा है। एम्स के डॉक्टरों ने एक शोध किया है कि जिससे पता चला कि पैंट की जेब में मोबाइल रखना, तनाव, धूम्रपान व नशा करने से स्पर्म का डीएनए खराब हो रहा है जो बच्चों में आंख के कैंसर जैसी जेनेटिक बीमारी का कारण बन रहा है। 

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दावा है कि पिता की खराब जीवनशैली से बच्चों में आंख का कैंसर बन सकता है। एम्स के मालिक्यूलर रिप्रोडक्शन एंड जेनेटिक फैसिलिटी की प्रभारी प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा ने आंखों के कैंसर से पीड़ित 75 बच्चों में बीमारियों के कारणों का पता लगाने के लिए जेनेटिक अध्ययन किया है। 

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इस दौरान बच्चों के पिता के स्पर्म की जेनेटिक जांच की गई। इसमें 40 फीसदी मामलों में आरबी (रेटिनोब्लास्टोमा) जीन में म्युटेशन पाया गया। बाकी मामलों में कई अन्य तरह के जीन में म्युटेशन पाए गए जो आंखों के कैंसर का कारण बना। अभी आरबी जीन के अलावा दूसरे जीन की जांच भी की जाएगी। स्पर्म का डीएनए खराब होने का कारण आक्सीडेटिव स्ट्रेस है।

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बच्चों की आंख में कैंसर के इलाज में स्वदेशी प्लाक ब्रेकीथेरेपी सफल
बच्चों की आंखों में कैंसर का प्रभावी इलाज स्वदेशी प्लाक ब्रेकीथेरेपी से संभव है। एम्स में तीन महीने से बच्चों का इस थेरेपी की मदद से इलाज किया जा रहा है। अभी तक के परिणाम बेहतर आए हैं। एम्स पहले इन प्लाक को जर्मनी से आयात करता था, जो काफी महंगे होने के साथ उपलब्धता कम थी। इस समस्या को देखते हुए एम्स ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) के साथ मिलकर बच्चों के लिए स्वदेशी प्लाक को तैयार किया जो एम्स में बच्चों के उपचार के लिए केंद्र सरकार के सहयोग से मुफ्त उपलब्ध है।

इस थेरेपी में प्लाक को सर्जरी कर बच्चों की आंखों से जोड़ दिया जाता है। इसी प्लाक की मदद से आंखों से ट्यूमर को हटाने के लिए रेडियोथेरेपी दी जाती है। ट्यूमर के आधार पर इसके माध्यम से रेडियोथेरेपी अलग-अलग दिन तक दी जाती है। इस दौरान बच्चा आइसोलेशन में रहता है। जब रेडियोथेरेपी पूरी हो जाती है तो प्लाक को सर्जरी करके आंख से हटा दिया जाता है और उसका इस्तेमाल दूसरे बच्चे पर किया जाता है।

इस बारे में एम्स के डॉ. आरपी सेंटर की प्रोफेसर डॉ. भावना चावला ने बताया कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में रेटिनो ब्लास्टोमा (आंखों का कैंसर) के मामले पाए जाते हैं। यदि समय पर इसका इलाज कर दिया जाए तो बच्चे की जांच के साथ उसकी नजर के साथ आंखों को भी बचाया जा सकता है। पहले रेटिनो ब्लास्टोमा का पता काफी एडवांस स्टेज में चलता था, उस समय सर्जरी करके ट्यूमर के साथ पूरी आंख को निकालना पड़ता था। इसके बाद कीमोथेरेपी होती थी। 

अब कई नई थेरेपी आ गई हैं जिससे आंखों के साथ नजर को भी बचाया जा सकता है। इस कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी की मदद से आंख को बचा सकते हैं। यह सुविधा केंद्र सरकार के सहयोग से एम्स में मुफ्त उपलब्ध है। एम्स ने बार्क के साथ मिलकर प्लाक ब्रेकीथेरेपी बच्चों के लिए शुरू की है। इस स्वदेशी थेरेपी की मदद से आंख और नजर बचाई जा सकती है। इस थेरेपी में प्लाक को सर्जरी कर आंख पर फिक्स कर दिया जाता है और इसी से रेडियोथेरेपी दी जाती है। थेरेपी के बाद इसे हटा दिया जाता है। 3-4 बच्चों पर इसका इस्तेमाल किया गया तो परिणाम बेहतर आए। रेटिनो ब्लास्टोमा से बचाव के लिए एम्स में शुक्रवार को वॉकथान का आयोजन किया गया। इसमें पीड़ित बड़े बच्चे भी आए जिनका लंबे समय पहले एम्स में उपचार हुआ और वह अब पूरी तरह से ठीक हैं। इनमें से एक बच्चा कलाकृति बना रहा है।

इन्हें देनी पड़ता है थेरेपी
डॉ. भावना बताया कि स्वदेशी प्लाक ब्रेकीथेरेपी उन बच्चों को दी जाती है जिनमें कीमोथेरेपी नाकाम रही है या यह तकनीक काम नहीं कर रही हो। इसके अलावा जिन बच्चों दिख रहा है उसे बचाया जा सकता है। वहीं, ऐसे बच्चे जिसकी पहले से एक आंख निकाल दी गई हो और दूसरी आंख को बचाना हो।

किन्हें होती है समस्या
रेटिनो ब्लास्टोमा की समस्या उन बच्चों में ज्यादा पाई जाती है जिनके माता-पिता में यह पहले से हो। यह जेनेटिक कारणों से हो सकती है। इसके अलावा कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसमें ट्यूमर रेटिना से उत्पन्न होता है और फैल जाता है। यह पांच साल से कम उम्र के बच्चों में पाया जाता है। पीड़ित एक तिहाई बच्चों के दोनों आंख में यह हो जाता है।

एम्स में हर माह आते हैं 40 बच्चे
एम्स में रेटिनो ब्लास्टोमा से पीड़ित हर माह 35 से 40 मरीज आते हैं। एम्स नॉर्थ इंडिया का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां जम्मू-कश्मीर, नार्थ ईस्ट, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, नेपाल सहित अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में बच्चे उपचार के लिए आते हैं। एम्स में इस बीमारी का उपचार पूरी तरह से मुफ्त है।

बच्चों में लक्षण
आंखों की काली पुतली में चमक दिखाई देना, तिरछा दिखाई देना, रोशनी कम होना, आंखों में लाली, आंखों में दर्द।

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