'लाल दुर्ग' में खामोशी से हो रही कन्हैया और JNU बचाओ पर बात
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‘लाल दुर्ग’ में छह दिनों से जारी छात्रों की हड़ताल बेशक खत्म हो गई लेकिन कैंपस की रौनक फीकी पड़ गयी है। छात्र कक्षाओं में लौटने लगे हैं लेकिन लाइब्रेरी से बाहर आते ही कन्हैया की रिहाई पर सवाल पूछते हैं।
दुनिया भर के मुद्दों पर नजर रखने वाले और उन पर डिबेट करने वाले छात्र इन दिनों सिर्फ कन्हैया और जेएनयू बचाओ पर ही बात कर रहे हैं। जेएनयू कंफेशन पेज हो या फिर ढाबा हर जगह बस एक ही चर्चा और रणनीति बनती दिख रही है।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय वामपंथी विचारधारा का समर्थक ही नहीं, अभिव्यक्ति की आजादी समेत बिना हिचक आलोचना करने के नाम से जाना जाता है। कैंपस में छात्र पढ़ाई करते हैं और शाम ढलते ही रात गुलजार होता है।
ढाबों में देर रात तक विभिन्न मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखी जाती है, जहां लड़का या लड़की का भी भेदभाव नहीं होता है। इसी के तहत नौ फरवरी को कार्यक्रम का आयोजन हुआ।
अब ढ़ाबों पर नहीं मिलते छात्र
लेकिन छात्रों ने विश्वविद्यालय से सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर अनुमति मांगी और अफजल गुरु शहादत दिवस मना लिया। अफजल की फांसी पर चर्चा तक ठीक था पर देशविरोधी नारों के चलते जेएनयू इतिहास में काला दिन बन गया।
ढाबे सुनसान, फोन स्विच ऑफ
हाथों में सिगरेट, कंधे पर किताबों का झोला, लंबा कुर्ता, दाढ़ी और बाथरूम स्लीपर के साथ गिटार, ढफली की थाप पर झुमने वाले लाल दुर्ग के छात्र इन दिनों ढाबा पर भी नहीं मिलते हैं।
फोन स्विच ऑफ तो सोशल मीडिया के अकाउंट हाइड कर रखे है। ढाबे इन दिनों सुनसान रहते हैं। छात्र अकेडमिक ब्लॉक में मिलते हैं पर मुद्दों पर आजादी से अपनी बात रखने के नाम नो कमेंट कहकर खिसक जाते हैं।
एआईएसएफ की पदाधिकारी रेहला कहती हैं कि अब हॉस्टल से लेकर ढाबा सुनसान हैं। क्योंकि दिल में एक डर है कि कल क्या होगा।