मूर्तियों के विसर्जन से यमुना में बढ़ रहा है प्रदूषण, 11 गुना बढ़ा क्रोमियम
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मूर्तियां बनाने में प्रतिबंधित कृत्रिम उत्पादों, जहरीले पेंट के इस्तेमाल का नुकसान यमुना को भी उठाना पड़ रहा है। यहां मूर्ति विसर्जन होने के कारण यमुना में भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) की मात्रा में कई गुना इजाफा हो चुका है। यमुना की सफाई पर निगरानी रख रही मॉनिटरिंग कमेटी के मुताबिक अलग-अलग धार्मिक आयोजनों के बाद यमुना में मूर्तियों के विसर्जन से यह समस्या और गंभीर रूप लेती जा रही है। मूर्तियां बनाने में प्रतिबंधित उत्पादों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है, जिनके विसर्जन से यमुना और भी प्रदूषित हो रही है। क्रोमियम, लोहा, निकेल और लेड की मात्रा में कई गुना तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे बीमारियों का भी गंभीर खतरा मंडराने लगा है। यमुनोत्री से इलाहाबाद तक प्रवाहित होने वाले यमुना के कुल 1370 किलोमीटर की तुलना में दिल्ली में यमुना के महज दो फीसदी प्रवाह क्षेत्र में करीब 76 फीसदी प्रदूषण हो रहा है।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने गणेश चतुर्थी और दुर्गा पूजा के बाद मूर्तियों के विसर्जन को लेकर आगाह करते हुए कहा था कि इससे यमुना को काफी नुकसान हो रहा है। इसे बेहद खतरनाक बताते हुए मूर्तियों के यमुना में विसर्जन किए जाने को अनुचित बताते हुए इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटी गठित की थी। अपने वजूद को कायम रखने के लिए संघर्ष करती यमुना में बढ़ते प्रदूषण को लेकर कमेटी को रिपोर्ट सौंपने को कहा था।
सीपीसीबी के मुताबिक साल के नौ महीने यमुना के अधिकतर हिस्से में पानी नहीं होता है, नतीजतन उसमें किसी भी तरह के अवांछित या खतरनाक अवशेषों के प्रवाह को बंद करने की सिफारिश की गई थी। इस मामले में सख्ती करते हुए प्रदूषण पर शिकंजा कसने के लिए अनदेखी करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ भारी जुर्माना किए जाने की भी कवायद की गई। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की गठित मॉनिटरिंग कमेटी ने पेंट की गई मूर्तियों को प्रदूषण के लिहाज से खतरनाक बताते हुए कहा कि इससे हैवी मेटल्स में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
सीपीसीबी के मुताबिक पॉलिश और पेंट से तैयार की गई चमकदार मूर्तियों के विसर्जन से यमुना में क्रोमियम के स्तर में 11 गुना तक बढ़ोतरी हो गई है। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के मानकों के मुताबिक क्रोमियम की अधिकतम सीमा 0.05 मिलीग्राम/लीटर होनी चाहिए। यमुना में लोहा भी तय 0.3 मिलीग्राम प्रतिलीटर के मानक से 71 गुना अधिक है लेड के स्तर में दो गुना भी बढ़ोतरी के साथ-साथ निकेल की मात्रा भी बढ़ी है। गणेश चतुर्थी के मौके पर मूर्तियों के विसर्जन से प्रदूषणकारी तत्वों में बढ़ोतरी दर्ज हुई है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
सीपीसीबी ने लगातार गंभीर हो रहे हालात से होने वाले प्रदूषण के प्रति लोगों को आगाह करते हुए उनमें जागरूकता बढ़ाने को जरूरी बताया। शोधकर्ताओं के मुताबिक जहरीले भारी धातुओं के कारण न केवल यमुना का प्रदूषण बढ़ रहा है बल्कि यह लोगों के मस्तिष्क, फे फड़ा, लीवर खराब होने सहित रक्त की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकता है। लंबे समय तक इसके संपर्क से मल्टिपल सिरोसिस, पार्किंसन और एल्जाइमर्स के अलावा कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
सीपीसीबी ने जहरीले पेंट और पॉलिश से तैयार होने वाली मूर्तियों के विसर्जन के कारण होने वाले प्रदूषण से बचने के लिए मिट्टी व अन्य प्राकृतिक उत्पादों के इस्तेमाल की सलाह देते हुए प्लास्टर ऑफ पेरिस का इस्तेमाल न करने को कहा है। जुलाई में एनजीटी के चेयरपर्सन की ओर से गठित मॉनिटरिंग कमेटी ने मूर्तियों को पेंट करने में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल और जहरीले केमिकल्स का इस्तेमाल न करने की हिदायत देते हुए कमेटी को इस संबंध में 31 दिसंबर तक रिपोर्ट सौंपने को कहा था। इसके बाद राजधानी में डीएमसी, डीडीए, सीपीसीबी और डीपीसीसी को ऐसे आयोजनों के लिए पूजा पंडाल को मंजूरी देने से पहले सीपीसीबी के तय मानकों को लागू किए जाने को सुनिश्चित करने को कहा था। इसपर निगरानी रखने के लिए औचक निरीक्षण के बाद अनदेखी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की कमेटी ने सिफारिश की है। साथ ही आम लोगों को इससे होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करने को कहा गया है ताकि यमुना को कृत्रिम उत्पादों से और नुकसान न पहुंचे।
कमेटी की ओर से पहले कहा गया है कि दो फीसदी से भी कम यमुना के क्षेत्र से नदियों में होने वाला 76 फीसदी प्रदूषण दिल्ली में हो रहा है। पीटीआई को हासिल एक्शन प्लान की प्रति के मुताबिक पल्ला से बदरपुर के 54 किलोमीटर, वजीराबाद से ओखला के 22 किलोमीटर के दायरे में बहने वाली यमुना के दो फीसदी क्षेत्र (यमुनोत्री से इलाहाबाद तक यमुना के कुल 1370 किलोमीटर के प्रवाह क्षेत्र) में करीब 76 फीसदी प्रदूषण हो रहा है। दिल्ली की जीवन रेखा देश की सर्वाधिक प्रदूषण नदियों में से एक हो गई है, जिसमें घरेलू और औद्योगिक क्षेत्र से करीब 85 फीसदी प्रदूषण फैल रहा है। घरों और औद्योगिक इकाईयों से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्वों की वजह से यमुना का पानी प्रदूषित होकर गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है।