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नाम नहीं जनता को चाहिए काम, नाम तक सिमट रही मेवात की राजनीति

Wed, 27 Jul 2016 10:16 AM IST
दिनेश देशवाल/अमर उजाला, गुड़गांव
दिनेश देशवाल/अमर उजाला, गुड़गांव Updated Wed, 27 Jul 2016 10:16 AM IST
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people of mewat want work from their representative than to change its name

क्या मेवात जिले का नाम बदलना ही अब सिर्फ राजनीति रह गया है? यह सवाल आज मेवात के लोग कर रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि उन्हें विकास का हक कब मिलेगा? नाम बदलने की राजनीति को एक बार फिर से कांग्रेस का कार्यकर्ता सम्मेलन हवा दे गया, जिसमें पूर्व मंत्री करण सिंह दलाल ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की उपस्थिति में उनकी सरकार बनने पर फिर से जिले का नाम बदलकर मेवात रखने की घोषणा की।

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बता दें कि तत्कालीन मुयमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने 2 अक्टूवर 2004 को नूंह के वाईएमडी कॉलेज में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मेवात के हिस्से को गुड़गांव जिले से अलग कर नया जिला बनाने की घोषणा की थी।
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जिसका नाम सत्यमेव पुरम रखा गया था तथा जिला बनाने का शिलान्यास पशुपालन विभाग के कार्यालय के सामने से जा रहे रोड पर किया था। इस रोड का नाम बहादुरचंद मार्ग रखा गया था। जिले के शिलान्यास का पत्थर लगाने के लिए रोड किनारे एक स्मारक बनाया गया था। लेकिन वह इसके लिए गजट नोटिफिकेशन नहीं कर पाए थे और सत्ता हाथ से चली गई थी।
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इसके बाद प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सत्ता आई और भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 4 अप्रैल 2005 को मेवात के नाम से प्रदेश में 20वां जिला बना दिया। इस दौरान जिले के नाम को लेकर कई सामाजिक संगठनों ने आवाजें उठाई कि मेवात एक क्षेत्र का नाम है, जबकि जिला का नाम जिला मुख्यालय के शहर के नाम पर होता हैं। मेवात क्षेत्र हरियाणा के मेवात व पलवल जिला, राजस्थान व उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ है।

साथ ही दूसरे राज्यों के मेवात के अपराधी कोई अपराध करते हैं तो उसे मेवाती गैंग का नाम दिया जाता है, जिससे मेवात जिले का नाम खराब होता है। इसलिए जिले का नाम बदलकर नूंह रखा जाए।

वर्ष 2015 में भाजपा की सरकार बनी और मार्च-2016 में जिले का नाम मेवात से बदलकर नूंह रखने को मंजूरी दे दी। यहां बडा सवाल यह उठता है कि राजनीतिक दल मेवात के नाम को लेकर लगातार राजनीतिक रोटियां सेकने का काम कर रहे हैं। मेवात का विकास नहीं हो रहा।

मेवात में स्कूल, कॉलेज, आईटीआई तो हैं, लेकिन उनमें बच्चों को पढ़ाने के लिए अध्यापक ही नहीं हैं। मेवात के करीब 78 विद्यालय बिना अध्यापकों के चल रहे हैं। आईएमटी के लिए 1600 एकड जमीन अधिग्रहित की, लेकिन अभी तक उसे विकसित करने पर सरकार का ध्यान नहीं हैं।


मेवात के सामाजिक संगठनों से जुडे व आम लोगों का कहना है कि उन्हें जिले का नाम क्या हो, इससे ज्यादा मतलब नहीं हैं, बल्कि उन्हें काम चाहिए। मेवात विकास मंच के अध्यक्ष जाहिद हुसैन, मेवात विकास परिषद के संरक्षक एडवोकेट खलील अहमद, पूर्व बार प्रधान ताहिर रुपडिया, समाजसेवी विष्णु सिंगला, बीआर देशवाल, नत्थूराम गुर्जर का कहना है कि जिले की जनता आज भी बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। राजनीतिक दलों का चाहिए कि वे सत्ता में रहकर मेवात का विकास करें और विपक्ष में रहकर मेवात के विकास की आवाज उठाएं। नाम की बजाय जनता को काम चाहिए।

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