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संसद सुरक्षा चूक मामला: आरोपी नीलम के खिलाफ ठोस सबूत...वकील की दलीलें सुन कोर्ट ने जमानत पर फैसला रखा सुरक्षित
Mon, 09 Sep 2024 06:37 PM IST
अनुज कुमार
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: अनुज कुमार
Updated Mon, 09 Sep 2024 06:37 PM IST
सार
संसद सुरक्षा उल्लंघन मामलें में आरोपी नीलम आजाद की जमानत पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर के लिए तय की।
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संसद सुरक्षा चूक मामला (फाइल फोटो)
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
पटियाला हाउस कोर्ट ने पिछले साल संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने के मामले में आरोपी नीलम आजाद की जमानत याचिका पर सोमवार को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। दलीलें सुनने के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरदीप कौर ने फैसला सुरक्षित रखा।
उन्होंने अगली सुनवाई 11 सितंबर के लिए तय कर दी। आरोपी की जमानत याचिका का विरोध करते हुए विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) अखंड प्रताप सिंह ने दलील दी कि वर्तमान आरोपी के खिलाफ मजबूत, ठोस, विश्वसनीय सामग्री, साक्ष्य और अन्य दस्तावेज मौजूद हैं, जो उसे जमानत पर रिहा करने के हकदार नहीं बनाते हैं।
एसपीपी ने कहा कि वर्तमान आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य व अन्य दस्तावेज मौजूद हैं। जो अपराध में उसकी संलिप्तता को दर्शाते हैं, जिसके कारण उसके विरुद्ध गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के प्रावधान लागू होते हैं।
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अपराध की प्रकृति या अपराध की गंभीरता और सजा की गंभीरता भी जमानत पर विचार करने के चरण में प्रासंगिक विचार हैं। दिल्ली पुलिस ने कहा कि सामग्री, साक्ष्य और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य अपराध में उसकी संलिप्तता को दर्शाते हैं। इस प्रकार उसे जमानत पर रिहा करने का अधिकार नहीं है।
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उन्होंने अगली सुनवाई 11 सितंबर के लिए तय कर दी। आरोपी की जमानत याचिका का विरोध करते हुए विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) अखंड प्रताप सिंह ने दलील दी कि वर्तमान आरोपी के खिलाफ मजबूत, ठोस, विश्वसनीय सामग्री, साक्ष्य और अन्य दस्तावेज मौजूद हैं, जो उसे जमानत पर रिहा करने के हकदार नहीं बनाते हैं।
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एसपीपी ने कहा कि वर्तमान आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य व अन्य दस्तावेज मौजूद हैं। जो अपराध में उसकी संलिप्तता को दर्शाते हैं, जिसके कारण उसके विरुद्ध गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के प्रावधान लागू होते हैं।
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अपराध की प्रकृति या अपराध की गंभीरता और सजा की गंभीरता भी जमानत पर विचार करने के चरण में प्रासंगिक विचार हैं। दिल्ली पुलिस ने कहा कि सामग्री, साक्ष्य और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य अपराध में उसकी संलिप्तता को दर्शाते हैं। इस प्रकार उसे जमानत पर रिहा करने का अधिकार नहीं है।