हंगामा क्यों है बरपा: आखिर क्या है ऑक्सीजन ऑडिट रिपोर्ट में, जिससे सबके निशाने पर हैं केजरीवाल
आइए जानते हैं कि जिस रिपोर्ट को लेकर इतना हंगामा बरपा हुआ है और दिल्ली के मुख्यमंत्री तक को दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से हो रही मौतोेंं का जिम्मेदार बता दिया गया है आखिर उस रिपोर्ट में ऐसा क्या है....
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देश की राजधानी दिल्ली में कोविड की दूसरी लहर जब अपने चरम पर थी तो यहां ऑक्सीजन की मांग में भी बेतहाशा वृद्धि हो गई थी। चाहे सोशल मीडिया देखें या टीवी चैनल हर जगह लोग अप्रैल और मई माह में ऑक्सीजन की मांग कर रहे थे। कई अस्पताल और यहां तक कि मरीजों के तीमारदार भी ऑक्सीजन की मांग को लेकर कोर्ट जा पहुंचे थे। दिल्ली में ऑक्सीजन की इसी किल्लत को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छह मई को 12 सदस्यों वाली एक ऑक्सीजन कमेटी गठित की थी, जिसके अध्यक्ष दिल्ली एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया को बनाया था। इस कमेटी ने अपनी एक रिपोर्ट तैयार की है जिसे लेकर शुक्रवार(25 जून) की सुबह से ही भाजपा और कांग्रेस दिल्ली सरकार पर हमला बोल रही हैं। वहीं केजरीवाल सरकार ने इसका खंडन करते हुए कहा है कि ऐसी कोई रिपोर्ट है ही नहीं। आइए जानते हैं कि जिस रिपोर्ट को लेकर इतना हंगामा बरपा हुआ है और दिल्ली के मुख्यमंत्री तक को दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से हो रही मौतोेंं का जिम्मेदार बता दिया गया है आखिर उस रिपोर्ट में ऐसा क्या है....
रिपोर्ट में क्या है-
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी में शीर्ष अदालत में 163 पन्नों के हलफनामे में कहा है कि कोविड -19 महामारी की दूसरी लहर के चरम के दौरान दिल्ली सरकार द्वारा चार गुना ज्यादा ऑक्सीजन की मांग की गई। जहां दिल्ली को उस वक्त करीब 300 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत थी केजरीवाल सरकार ने 1000 मीट्रिक टन से भी ज्यादा की मांग उस वक्त की।
- दिल्ली सरकार की अधिक मांग की वजह से उस वक्त 12 अन्य राज्यों को परेशानी उठानी पड़ी क्योंकि वहां के ऑक्सीजन कोटे को कम करके दिल्ली की मांग की पूर्ति की गई।
- दिल्ली सरकार के डाटा के अनुसार 183 अस्पतालों को ऑक्सीजन की वास्तविक जरूरत 1140 मीट्रिक टन थी। जबकि चार अस्पतालों द्वारा की गई गलत रिपोर्टिंग में सुधार के बाद दिल्ली के अस्पतालों में वास्तविक जरूरत 209 मीट्रिक टन पाई गई। भारत सरकार के द्वारा दिए गए फॉर्मूले के अनुसार ऑक्सीजन की खपत 289 मीट्रिक टन थी, जबकि दिल्ली सरकार के फॉर्मूला के अनुसार यही खपत 391 मीट्रिक टन हो गई।
- पैनल ने कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली सरकार ने गलत फॉर्मूले का इस्तेमाल किया और 30 अप्रैल को अतिरंजित दावे किए। कुछ अस्पताल किलोलीटर और मीट्रिक टन के बीच अंतर नहीं कर सके।
- पैनल ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि दिल्ली ने शीर्ष अदालत में किस आधार पर 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की मांग की। ऑडिट के लिए एकत्र किए गए डाटा में बड़ी गलतियां थीं।
पैनल में कौन-कौन
- छह मई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दायर गठित पैनल में एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया को अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। पैनल में जल शक्ति मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुबोध यादव, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के प्रमुख सचिव (गृह) भूपिंदर एस भल्ला, मैक्स अस्पताल, दिल्ली के संदीप भूधिराजा और पेसो के संजय कुमार सिंह भी शामिल हैं।
- इस पैनल ने 10,11, 12,13,15,18 और 21 मई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक की। दिल्ली के सभी अस्पतालों के नोडल अशिकारियों के जरिए ऑक्सीजन की उपलब्धता और खपत से संबंधित रिपोर्ट मांगी।
- पैनल ने पाया कि दिल्ली के कई अस्पताल ने निगेटिव खपत की बात भी पता चली। यानी कुछ अस्पताल में ऑक्सीजन की आपूर्ति, खपत से अधिक थी।