{"_id":"5e03fb838ebc3e87952b3028","slug":"opposition-to-remove-punjabi-as-a-second-language-from-haryana-schools","type":"story","status":"publish","title_hn":"हरियाणा के स्कूलों से पंजाबी को दूसरी भाषा के रूप में हटाने का विरोध","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हरियाणा के स्कूलों से पंजाबी को दूसरी भाषा के रूप में हटाने का विरोध
Thu, 26 Dec 2019 05:44 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 26 Dec 2019 05:44 AM IST
विज्ञापन
Manjinder Singh Sirsa
- फोटो : Social Media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने हरियाणा के स्कूलों में पंजाबी को दूसरी भाषा के रूप में हटाए जाने की निंदा की है। कमेटी ने इस फैसले की समीक्षा करने की मांग की है। इसे लेकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल को पत्र लिखा है।
विज्ञापन
कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि स्कूलों में पंजाबी की जगह तेलगू को लागू किए जाने के फैसले से राज्य की 40 फीसदी पंजाबी आबादी को झटका लगा है।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि हरियाणा तो पंजाब से ही अलग हुआ राज्य है और राज्य की आधी से ज्यादा आबादी की मुख्य भाषा पंजाबी है। उधर, जागो पार्टी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष मनजीत सिंह जीके ने कहा कि पंजाबी भाषा को हटाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। पंजाब प्रांत का हिस्सा रहे हरियाणा में पंजाबी भाषा को खत्म करने की साजिश की जा रही है।
विज्ञापन
नौकरी और सहायता का वादा
इससे पहले कमेटी की ओर से दंगा पीड़ितों को नौकरी दिलाने के लिए सहायता का वादा भी किया गया था। कहा गया था कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी सिख दंगे के पीड़ित परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी दिलाने के लिए कानूनी सहायता प्रदान करेगी। कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा था कि अदालत के आदेश के बावजूद 63 लोगों को अभी तक नौकरी नहीं मिली है।
उन्हें नौकरी दिलाने के लिए एक बैठक होगी। बैठक में शामिल होने के लिए पीड़ित परिवारों को बुलाया गया था। सिरसा ने कहा था कि विधानसभा में यह मामला उठाया गया था, लेकिन दिल्ली सरकार ने पीड़ित परिवारों को नौकरियां देना जरूरी नहीं समझा।