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Noida News: जिले में शतरंज प्रतिभाओं की नहीं कोच व संसाधनों की कमी
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जिले में शतरंज प्रतिभाओं की नहीं कोच व संसाधनों की कमी
स्कूल व कॉलेजों में शतरंज के गुर सीखने के बाद अन्य राज्यों का रुख कर रहे खिलाड़ी
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा/ग्रेटर नोएडा। जिले में शतरंज के खेल में प्रतिभाओं की नहीं बल्कि बेहतर कोच व संसाधनों की कमी है। जिले में तीन बड़े स्टेडियम बने हैं, लेकिन एक में भी शतरंज के लिए अकादमी संचालित नहीं है। कोच और सुविधाओं के अभाव में खिलाड़ियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं खिलाड़ियों को बेहतर तालीम के लिए ऑनलाइन कोचिंग का भी सहारा लेना पड़ रहा है। जिले में वंतिका अग्रवाल, अजय संतोष, पर्वता रेड्डी जैसे कई खिलाड़ी हैं, जिन्होंने ऑनलाइन गुरु का सहारा लेकर न सिर्फ एशियन गेम्स में जीत हासिल की, बल्कि ग्रैंड मास्टर और इंटरनेशनल मास्टर के नाम्स भी जीतने के कगार तक पहुंचने में सफलता पाई है।
दरअसल, जिले में बेहतर कोचिंग व प्रशिक्षित कोच की कमी के कारण स्कूल व कॉलेज स्तर के खिलाड़ियों को इस खेल में भविष्य संवारने के लिए दिल्ली या अन्य राज्यों की ओर रुख करना पड़ रहा है। इससे खिलाड़ियों का समय के साथ जेब भी ढीली हो रही है। वहीं, आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाएं जिले में संसाधनों के अभाव में अपना दम तोड़ देती हैं। वहीं, कुछ प्रतिभाएं सुविधाओं के अभाव में स्कूल व कॉलेजों तक ही सीमित होकर रह जाती हैं। बावजूद जिले के खिलाड़ी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फलक पर क्षेत्र व देश का नाम रोशन कर रहे हैं। वहीं, कुछ खिलाड़ी यूट्यूब के माध्यम से शतरंज खेलना सीखकर अपना कैरियर बनाने में जुटे हैं।
नोएडा निवासी वंतिका अग्रवाल विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिताओं में स्वर्ण, रजत व कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन कर चुकी हैं। एशियन चैंपियनशिप में भी वंतिका अग्रवाल ने रजत पदक जीतकर विश्व पटल पर देश को गौरवान्वित किया है। वंतिका ने चेस में महिला ग्रैंड मास्टर और अंतरराष्ट्रीय मास्टर का खिताब हासिल किया है। खेल अधिकारियों का कहना है कि ग्रेटर नोएडा के मलकपुर स्पोर्ट्स स्टेडियम में शतरंज के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं। आवेदन आने पर खेलकूद प्रोत्साहन समिति से मांग कर कोच की व्यवस्था करा दी जाएगी।
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जिले में शतरंज का माहौल तैयार करने की जरूरत
जिले में एसोसिएशन को सक्रिय करने के साथ बेहतर माहौल तैयार करने की भी जरूरत है। मौजूदा समय में कई खेल प्रतिभाएं बेहतर माहौल न मिल पाने के कारण शतरंज का साथ छोड़ देती हैं। इसके लिए जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर पर भी बेहतर रणनीति तैयार करने की जरूरत है। प्रदेश स्तर पर विजेताओं को दी जाने वाली पुरस्कार राशि में भी बढ़ोतरी की जानी चाहिए।
शतरंज का प्रशिक्षण भी महंगा
जिले में शतरंज की कई छोटी-छोटी अकादमियां हैं। इसके अलावा कुछ स्कूलों में भी शतरंज खेल को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन जब कोच की बात आती है तो अच्छे कोच तलाशने से भी नहीं मिलते। जिसके कारण महंगे और ऑनलाइन कोच ही एकमात्र विकल्प बच जाता है। ऑनलाइन माध्यम से कोच प्रति घंटे 1000 से 2000 रुपये तक फीस वसूलते हैं। इतनी महंगी फीस मध्यम आय वर्ग के बच्चों के लिए भरना मुश्किल होता है। सरकार को कोचिंग फीस पर भी नियंत्रण रखने की जरूरत है।
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मेरे लिए शतरंज खेल नहीं बल्कि एक कला है। यह प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य, हार में लचीलापन, कठिनाई और जीत का आनंद सिखाता है। दिमाग को अनिश्चितता का सामना करने, गंभीरता से सोचने व अनुकूलन करने की चुनौती देता है। - कृष्णा भाटिया, शतरंज खिलाड़ी।
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शतरंज खेलने से याददाश्त अच्छी होती है। कैलकुलेशन और गणित के सवाल हल करने में मदद मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे ध्यान भटकना कम हो जाता है। लक्ष्य पर फोकस कर पाते हैं। - अवनी तिवारी, शतरंज खिलाड़ी।
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शतरंज सबसे लोकप्रिय इंडोर गेम भी है। यह दिमाग के साथ-साथ ध्यान को भी केंद्रित करने में मदद करता है। - रुद्राक्ष शर्मा, शतरंज खिलाड़ी।
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ऑनलाइन कोचिंग की मदद से अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन किया है। मैंने एशियन यूथ शतरंज चैंपियनशिप 2024 कजाकिस्तान में रजत जीता। तीन दिन पहले स्लोवाकिया में पहला इंटरनेशनल मास्टर नॉर्म्स जीतने में सफल रहा। - अजय संतोष, पर्वतारेड्डी
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मलकपुर स्पोर्ट्स स्टेडियम में शतरंज खेल के लिए संसाधनों की सुविधा उपलब्ध है। शतरंज के लिए अभी तक एक भी खिलाड़ी का आवेदन नहीं आया है। आवेदन आने पर खेलकूद प्रोत्साहन समिति से कोच की मांग की जाएगी। - अनीता नागर, जिला उप-क्रीड़ा अधिकारी।
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स्कूल व कॉलेजों में शतरंज के गुर सीखने के बाद अन्य राज्यों का रुख कर रहे खिलाड़ी
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा/ग्रेटर नोएडा। जिले में शतरंज के खेल में प्रतिभाओं की नहीं बल्कि बेहतर कोच व संसाधनों की कमी है। जिले में तीन बड़े स्टेडियम बने हैं, लेकिन एक में भी शतरंज के लिए अकादमी संचालित नहीं है। कोच और सुविधाओं के अभाव में खिलाड़ियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं खिलाड़ियों को बेहतर तालीम के लिए ऑनलाइन कोचिंग का भी सहारा लेना पड़ रहा है। जिले में वंतिका अग्रवाल, अजय संतोष, पर्वता रेड्डी जैसे कई खिलाड़ी हैं, जिन्होंने ऑनलाइन गुरु का सहारा लेकर न सिर्फ एशियन गेम्स में जीत हासिल की, बल्कि ग्रैंड मास्टर और इंटरनेशनल मास्टर के नाम्स भी जीतने के कगार तक पहुंचने में सफलता पाई है।
दरअसल, जिले में बेहतर कोचिंग व प्रशिक्षित कोच की कमी के कारण स्कूल व कॉलेज स्तर के खिलाड़ियों को इस खेल में भविष्य संवारने के लिए दिल्ली या अन्य राज्यों की ओर रुख करना पड़ रहा है। इससे खिलाड़ियों का समय के साथ जेब भी ढीली हो रही है। वहीं, आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाएं जिले में संसाधनों के अभाव में अपना दम तोड़ देती हैं। वहीं, कुछ प्रतिभाएं सुविधाओं के अभाव में स्कूल व कॉलेजों तक ही सीमित होकर रह जाती हैं। बावजूद जिले के खिलाड़ी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फलक पर क्षेत्र व देश का नाम रोशन कर रहे हैं। वहीं, कुछ खिलाड़ी यूट्यूब के माध्यम से शतरंज खेलना सीखकर अपना कैरियर बनाने में जुटे हैं।
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नोएडा निवासी वंतिका अग्रवाल विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिताओं में स्वर्ण, रजत व कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन कर चुकी हैं। एशियन चैंपियनशिप में भी वंतिका अग्रवाल ने रजत पदक जीतकर विश्व पटल पर देश को गौरवान्वित किया है। वंतिका ने चेस में महिला ग्रैंड मास्टर और अंतरराष्ट्रीय मास्टर का खिताब हासिल किया है। खेल अधिकारियों का कहना है कि ग्रेटर नोएडा के मलकपुर स्पोर्ट्स स्टेडियम में शतरंज के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं। आवेदन आने पर खेलकूद प्रोत्साहन समिति से मांग कर कोच की व्यवस्था करा दी जाएगी।
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जिले में शतरंज का माहौल तैयार करने की जरूरत
जिले में एसोसिएशन को सक्रिय करने के साथ बेहतर माहौल तैयार करने की भी जरूरत है। मौजूदा समय में कई खेल प्रतिभाएं बेहतर माहौल न मिल पाने के कारण शतरंज का साथ छोड़ देती हैं। इसके लिए जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर पर भी बेहतर रणनीति तैयार करने की जरूरत है। प्रदेश स्तर पर विजेताओं को दी जाने वाली पुरस्कार राशि में भी बढ़ोतरी की जानी चाहिए।
शतरंज का प्रशिक्षण भी महंगा
जिले में शतरंज की कई छोटी-छोटी अकादमियां हैं। इसके अलावा कुछ स्कूलों में भी शतरंज खेल को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन जब कोच की बात आती है तो अच्छे कोच तलाशने से भी नहीं मिलते। जिसके कारण महंगे और ऑनलाइन कोच ही एकमात्र विकल्प बच जाता है। ऑनलाइन माध्यम से कोच प्रति घंटे 1000 से 2000 रुपये तक फीस वसूलते हैं। इतनी महंगी फीस मध्यम आय वर्ग के बच्चों के लिए भरना मुश्किल होता है। सरकार को कोचिंग फीस पर भी नियंत्रण रखने की जरूरत है।
मेरे लिए शतरंज खेल नहीं बल्कि एक कला है। यह प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य, हार में लचीलापन, कठिनाई और जीत का आनंद सिखाता है। दिमाग को अनिश्चितता का सामना करने, गंभीरता से सोचने व अनुकूलन करने की चुनौती देता है। - कृष्णा भाटिया, शतरंज खिलाड़ी।
शतरंज खेलने से याददाश्त अच्छी होती है। कैलकुलेशन और गणित के सवाल हल करने में मदद मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे ध्यान भटकना कम हो जाता है। लक्ष्य पर फोकस कर पाते हैं। - अवनी तिवारी, शतरंज खिलाड़ी।
शतरंज सबसे लोकप्रिय इंडोर गेम भी है। यह दिमाग के साथ-साथ ध्यान को भी केंद्रित करने में मदद करता है। - रुद्राक्ष शर्मा, शतरंज खिलाड़ी।
ऑनलाइन कोचिंग की मदद से अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन किया है। मैंने एशियन यूथ शतरंज चैंपियनशिप 2024 कजाकिस्तान में रजत जीता। तीन दिन पहले स्लोवाकिया में पहला इंटरनेशनल मास्टर नॉर्म्स जीतने में सफल रहा। - अजय संतोष, पर्वतारेड्डी
मलकपुर स्पोर्ट्स स्टेडियम में शतरंज खेल के लिए संसाधनों की सुविधा उपलब्ध है। शतरंज के लिए अभी तक एक भी खिलाड़ी का आवेदन नहीं आया है। आवेदन आने पर खेलकूद प्रोत्साहन समिति से कोच की मांग की जाएगी। - अनीता नागर, जिला उप-क्रीड़ा अधिकारी।