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Noida News: गैंडों को रास आ रही दुधवा नेशनल पार्क की आबोहवा

Mon, 22 Sep 2025 12:01 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 22 Sep 2025 12:01 AM IST
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The rhinos are enjoying the climate of Dudhwa National Park.
दुधवा पार्क में स्वछंद विचरण करता गैंडा। स्त्रोत- वन विभाग।
बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। पुरखों की धरती पर फिर से आबाद हुए गैंडों को दुधवा की आबोहवा खूब रास आ रही है। वर्ष 1984 में दुधवा नेशनल पार्क में पांच गैंडों से शुरू की गई पुनर्वासन योजना में 41 साल में इनका कुनबा बढ़कर 51 तक पहुंच गया है। अब इन गैंडों को जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए आजाद किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके तहत अब तक चार गैंडों को आजाद किया जा चुका है।
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वर्ष 1977 में दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना होने के साथ ही गैंडा पुनर्वासन शुरू करने की योजना बनी थी। पार्क के अधिकारियों के मुताबिक, कभी तराई का जंगल एक सींग वाले गैंडों का प्राकृतवास हुआ करता था। शिकार के चलते वर्ष 1978 में दुधवा में गैंडों का अस्तित्व समाप्त हो गया।
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दुधवा पार्क की स्थापना के बाद जंगल के वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि यहां का वन क्षेत्र गैंडों के लिए काफी अनुकूल है। यहां 14 प्रजातियों की वे वनस्पतियां प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं, जिन्हें गैंडे बड़े चाव से खाते हैं। इसे देखते हुए गैंडों को फिर से उनके पुरखों की धरती पर बसाने के लिए पुनर्वासन योजना बनाई गई।
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चार गैंडों के बदले नेपाल को दिए गए 16 हाथी
वर्ष 1984 में असम के नौगांव जिले के जंगल से तीन मादा गैंडा पावित्री, सहेली, आशा और दो नर गैंडों बांके व राजू, को दुधवा लाया गया। इन्हें एक अप्रैल 1984 को दुधवा के ककरहा जंगल में करीब 33 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के सौर ऊर्जा चालित बाड़ में छोड़ा गया। इनमें दो मादा गैंडा गर्भवती थीं। इनमें सहेली की 12 अप्रैल और आशा की 31 जुलाई 1984 को मौत हो गई।
दुधवा में गैंडों की वंशबेल बढ़ाने के लिए अप्रैल 1985 में नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से चार मादा गैंडों नारायणी, राप्ती, हिमरानी और स्वयंवरा को लाकर इसी घर में रखा गया। भारत ने इन चार गैंडों के बदले नेपाल को 16 हाथी दिए थे। पिछले 41 साल में इन गैंडों का कुनबा तेजी से बढ़ा है। मंद प्रजनन और कई खतरों के बीच अब यहां संख्या 51 हो गई है।

वर्ष 2018 में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-2 को मिला आकार
अंत: प्रजनन से उत्पन्न होने वाले आनुवंशिक दोष और प्रणय संघर्ष के खतरों से निबटने के लिए वर्ष 2018 में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-2 को आकार दिया गया। दरअसल, गैंडों में प्रणय संघर्ष की घटनाएं ज्यादा होती हैं। असम से लाया गया नर गैंडा बांके किसी अन्य नर गैंडे को मादा के पास फटकने नहीं देता था। इसीलिए इस गैंडा परिवार के अधिकतर सदस्य बांके की ही संतान हैं।
इससे आनुवंशिक बीमारियों और नस्ल कमजोर होने का खतरा बढ़ रहा था। इसे देखते हुए दुधवा पार्क के ही बेलरायां रेंज में 14 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को सौर उर्जा चालित बाड़ से घेरकर नेपोलियन नाम के नर और तीन मादा गैंडों को इसमें रखा गया। पांच साल में इस घर में गैंडा परिवार में सदस्यों की संख्या चार से बढ़कर छह हो गई, लेकिन हाल ही एक गैंडा शिशु की मौत के बाद संख्या पांच रह गई है।

तीन मादा और एक नर गैंडे को छोड़ा जा चुका है जंगल में
करीब चालीस साल तक सौर उर्जा चालित बाड़ में रहकर अपनी वंश वृद्धि करने वाले गैंडों को क्रमबद्ध ढंग से जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए आजाद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अब तक तीन मादा और एक नर गैंडों को रेडियो कॉलर लगाकर जंगल में छोड़ा जा चुका है। इसमें एक नर और तीन मादा शामिल हैं। इसके साथ ही कतर्नियाघाट जंगल में गैंडों को नया घर देने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।


डीटीआर की आबोहवा गैंडों के लिए बेहद अनुकूल है। यही कारण है कि गैंडे अपने पुरखों की धरती पर फलफूल रहे हैं। अब इन गैंडों को क्रमबद्ध ढंग से सौर ऊर्जा चालित बाड़ से आजाद कर स्वच्छंद विचरण के लिए जंगल में छोड़ा जा रहा है। - डाॅ. एच राजामोहन, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व
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