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ट्विन टावर मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खिले चेहरे
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नोएडा। सेक्टर-93ए में सुपरटेक के 40 मंजिला ट्विन टावर को ध्वस्त करने के मामले में एक खरीदार की अवमानना याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डर को लताड़ लगाते हुए कहा कि खरीदारों के पूरे पैसे वापस करें। साथ ही, प्राधिकरण के अधिकारियों को आदेश दिया कि 17 जनवरी तक उस एजेंसी का नाम पीठ को बताएं, जो ट्विन टावर को ध्वस्त करेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद प्राधिकरण के अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है। वहीं, एमराल्ड कोर्ट आरडब्ल्यूए और खरीदारों के चेहरे खिल गए हैं।
आरडब्ल्यूए के पूर्व अध्यक्ष राजेश राणा ने बताया कि खरीदार लंबे समय से ट्विन टावर के मामले में फंसे हुए थे। उन्हें घर मिला नहीं और पैसे वापस करने में भी बिल्डर आनाकानी कर रहा था। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उम्मीद जगी है कि बिल्डर जेल जाने से बचने के लिए निश्चित ही खरीदारों का पैसा वापस कर देगा।
इधर, सुप्रीम कोर्ट ने सुपरटेक को 30 नवंबर तक टावरों को गिराने का कार्य पूरा करने का निर्देश दिया था। यह भी कहा था कि बिल्डर ही इसे गिराने का पूरा खर्च देगा और प्राधिकरण इस पूरी कार्रवाई का पर्यवेक्षण करेगा। इसके बाद से ही नोएडा प्राधिकरण ने बिल्डर को कई बार मौखिक और लिखित आदेश जारी किए थे जिसके बाद बिल्डर ने कई कंपनियों को सामने लाने की बात कही थी, लेकिन 30 नवंबर तक बिल्डर किसी भी एजेंसी की कार्ययोजना प्राधिकरण में पेश नहीं कर पाया। इसके बाद से ही प्राधिकरण लगातार बिल्डर पर एजेंसी फाइनल करने के लिए दबाव बना रहा था।
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आरडब्ल्यूए के पूर्व अध्यक्ष राजेश राणा ने बताया कि खरीदार लंबे समय से ट्विन टावर के मामले में फंसे हुए थे। उन्हें घर मिला नहीं और पैसे वापस करने में भी बिल्डर आनाकानी कर रहा था। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उम्मीद जगी है कि बिल्डर जेल जाने से बचने के लिए निश्चित ही खरीदारों का पैसा वापस कर देगा।
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इधर, सुप्रीम कोर्ट ने सुपरटेक को 30 नवंबर तक टावरों को गिराने का कार्य पूरा करने का निर्देश दिया था। यह भी कहा था कि बिल्डर ही इसे गिराने का पूरा खर्च देगा और प्राधिकरण इस पूरी कार्रवाई का पर्यवेक्षण करेगा। इसके बाद से ही नोएडा प्राधिकरण ने बिल्डर को कई बार मौखिक और लिखित आदेश जारी किए थे जिसके बाद बिल्डर ने कई कंपनियों को सामने लाने की बात कही थी, लेकिन 30 नवंबर तक बिल्डर किसी भी एजेंसी की कार्ययोजना प्राधिकरण में पेश नहीं कर पाया। इसके बाद से ही प्राधिकरण लगातार बिल्डर पर एजेंसी फाइनल करने के लिए दबाव बना रहा था।
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