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दृष्टि बाधित की जिंदगी में कर रहे उजियारा
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तारकेश्वर पांडेय।
- फोटो : Mewat
दृष्टिबाधितों की जिंदगी में कर रहे उजियारा
अंतराम खटाना
नूंह। अपने लिए तो सब जीते हैं, लेकिन दूसरों के लिए जीने में जो आनंद मिलता है, वह मन को शांति प्रदान करता है। हम बिना स्वार्थ के बेसहारा लोगों के लिए कुछ कर पाएं तो इससे आत्मीय संतोष मिलेगा। यह कहना है इंडरी खंड के गांव महरौला स्थित राजकीय माध्यमिक विद्यालय में विज्ञान के अध्यापक तारकेश्वर पांडेय का। ये जिले में कई दृष्टिबाधितों को आजीविका की मुख्यधारा से जोड़ चुके हैं। उन्होंने दृष्टिबाधितों बच्चों को अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से पढ़ा-लिखाकर सरकारी नौकरी तक पहुंचाया।
बिहार के छपरा जिले के तारकेश्वर पांडेय अप्रैल 1991 में नेशनल एसोसिएशन फॉर ब्लाइंड संस्था में काम करने के दौरान सर्वे करने नूंह बस अड्डे पहुंचे। उन्होंने बस में भीख मांगते एक दृष्टिबाधित बच्चे को देखा और उसे अपने पास बुलाकर उसका नाम पूछा। उसने अपना नाम जाकिर हुसैन बताया। उन्होंने उसे भीख मांगना छोड़कर पढ़ाने की पेशकश की तो उसने चौंकते हुए कहा कि अंधे कहीं पढ़ते हैं। पांडेय ने जाकिर के घर जाकर उसके भाई से संपर्क कर पढ़ाने के लिए कहा तो भाई भी गुस्सा हो गया। काफी समझाने के बाद जाकिर का भाई मान गया और शाम को नूंह गोशाला में एक घंटे पढ़ने के लिए राजी कर लिया। इस दौरान जाकिर की पढ़ाई में रुचि देखकर उसका दाखिला जयसिंहपुर गांव के स्कूल करा दिया।
तारकेश्वर पांडेय के मार्गदर्शन में जिन आठ दृष्टिबाधितों को सरकारी नौकरी मिली है ,उनमें जाकिर हुसैन निवासी गुंडबास उजीना जो अभी गुरुग्राम के लेबर कोर्ट में रीडर के पद पर तैनात है। सलीम अहमद निवासी सौंख नूंह, जींद नगर परिषद में क्लर्क , गब्बर सिंह निवासी तावडू, सीनियर सेकेंडरी स्कूल राठीवास में क्लर्क के पद पर तैनात है। जसबीर सिंह निवासी कंकर खेड़ी नूंह, अभी रेवासन गांव के स्कूल में क्लर्क के पद पर तैनात है। पवन कुमार निवासी उजीना, दिल्ली में बैंक ऑफ इंडिया में क्लर्क है। अब्बास खान निवासी गांव मढ़ी नगीना नूंह के यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में क्लर्क के पद पर तैनात है। वहीं नूंह के खोड़ बसई गांव के निवासी अनीश भारतीय रेलवे दिल्ली में ग्रुप डी सेवाकर्मी है।
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अभी नहीं थमा है सफर
आठ दृष्टिबाधितों को नौकरी योग्य बनाने के बाद भी पांडेय का सफर नहीं थमा है। वह अब विक्रम सिंह, तावडू व इकबाल अहमद निवासी देवला नंगली को सरकारी नौकरी की तैयारी करवा रहे हैं। स्कूल में रहते हुए वे दृष्टिबाधित बच्चों की भी अलग से कक्षाएं लगाते हैं। उनका यही प्रयास रहता है कि दृष्टिबाधितों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए।
मरते दम तक करेंगे सेवा
तारकेश्वर पांडेय ने कहा कि किसी को नई जिंदगी मिल जाए इससे बड़ा कोई कार्य नहीं हो सकता। बस इसी सोच के साथ मरते दम तक दृष्टिबाधितों की सेवा करने का प्रण लिया है। इस कार्य को कभी नहीं रुकने देंगे। हर शनिवार व रविवार को वह दृष्टिबाधितों के लिए समय निकालते हैं।
एनआईवीएच से कोर्स कर बच्चों को पढ़ाया
अध्यापक तारकेश्वर पांडेय ने सरकारी नौकरी से पूर्व देहरादून स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द विजुअली हेंडिकेप्ट्स (एनआईवीएच) संस्थान से इस कोर्स को पूरा किया। इसके बाद उन्होंने एक ब्लाइंड संस्था में कार्य किया। इस संस्था के माध्यम से उनका इन बच्चों से संपर्क हुआ। कुछ समय बाद ही वह सरकारी अध्यापक बन गए। लेकिन, इन बच्चों के लगाव होने के कारण वह इनसे जुड़ें रहे।
क्या कहते हैं दृष्टि बाधित
दृष्टि बाधित जाकिर हुसैन, सलीम अहमद, विक्रम सिंह और गब्बर सिंह आदि ने बताया कि उन्हें बचपन से ही अध्यापक तारकेश्वर पांडे का मार्गदर्शन मिला। उन्होंने स्कूल में दाखिला कराकर उनकी पढ़ाई कराई। उनकी मेहनत से ही सरकारी नौकरी मिली है।
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अंतराम खटाना
नूंह। अपने लिए तो सब जीते हैं, लेकिन दूसरों के लिए जीने में जो आनंद मिलता है, वह मन को शांति प्रदान करता है। हम बिना स्वार्थ के बेसहारा लोगों के लिए कुछ कर पाएं तो इससे आत्मीय संतोष मिलेगा। यह कहना है इंडरी खंड के गांव महरौला स्थित राजकीय माध्यमिक विद्यालय में विज्ञान के अध्यापक तारकेश्वर पांडेय का। ये जिले में कई दृष्टिबाधितों को आजीविका की मुख्यधारा से जोड़ चुके हैं। उन्होंने दृष्टिबाधितों बच्चों को अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से पढ़ा-लिखाकर सरकारी नौकरी तक पहुंचाया।
बिहार के छपरा जिले के तारकेश्वर पांडेय अप्रैल 1991 में नेशनल एसोसिएशन फॉर ब्लाइंड संस्था में काम करने के दौरान सर्वे करने नूंह बस अड्डे पहुंचे। उन्होंने बस में भीख मांगते एक दृष्टिबाधित बच्चे को देखा और उसे अपने पास बुलाकर उसका नाम पूछा। उसने अपना नाम जाकिर हुसैन बताया। उन्होंने उसे भीख मांगना छोड़कर पढ़ाने की पेशकश की तो उसने चौंकते हुए कहा कि अंधे कहीं पढ़ते हैं। पांडेय ने जाकिर के घर जाकर उसके भाई से संपर्क कर पढ़ाने के लिए कहा तो भाई भी गुस्सा हो गया। काफी समझाने के बाद जाकिर का भाई मान गया और शाम को नूंह गोशाला में एक घंटे पढ़ने के लिए राजी कर लिया। इस दौरान जाकिर की पढ़ाई में रुचि देखकर उसका दाखिला जयसिंहपुर गांव के स्कूल करा दिया।
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तारकेश्वर पांडेय के मार्गदर्शन में जिन आठ दृष्टिबाधितों को सरकारी नौकरी मिली है ,उनमें जाकिर हुसैन निवासी गुंडबास उजीना जो अभी गुरुग्राम के लेबर कोर्ट में रीडर के पद पर तैनात है। सलीम अहमद निवासी सौंख नूंह, जींद नगर परिषद में क्लर्क , गब्बर सिंह निवासी तावडू, सीनियर सेकेंडरी स्कूल राठीवास में क्लर्क के पद पर तैनात है। जसबीर सिंह निवासी कंकर खेड़ी नूंह, अभी रेवासन गांव के स्कूल में क्लर्क के पद पर तैनात है। पवन कुमार निवासी उजीना, दिल्ली में बैंक ऑफ इंडिया में क्लर्क है। अब्बास खान निवासी गांव मढ़ी नगीना नूंह के यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में क्लर्क के पद पर तैनात है। वहीं नूंह के खोड़ बसई गांव के निवासी अनीश भारतीय रेलवे दिल्ली में ग्रुप डी सेवाकर्मी है।
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अभी नहीं थमा है सफर
आठ दृष्टिबाधितों को नौकरी योग्य बनाने के बाद भी पांडेय का सफर नहीं थमा है। वह अब विक्रम सिंह, तावडू व इकबाल अहमद निवासी देवला नंगली को सरकारी नौकरी की तैयारी करवा रहे हैं। स्कूल में रहते हुए वे दृष्टिबाधित बच्चों की भी अलग से कक्षाएं लगाते हैं। उनका यही प्रयास रहता है कि दृष्टिबाधितों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए।
मरते दम तक करेंगे सेवा
तारकेश्वर पांडेय ने कहा कि किसी को नई जिंदगी मिल जाए इससे बड़ा कोई कार्य नहीं हो सकता। बस इसी सोच के साथ मरते दम तक दृष्टिबाधितों की सेवा करने का प्रण लिया है। इस कार्य को कभी नहीं रुकने देंगे। हर शनिवार व रविवार को वह दृष्टिबाधितों के लिए समय निकालते हैं।
एनआईवीएच से कोर्स कर बच्चों को पढ़ाया
अध्यापक तारकेश्वर पांडेय ने सरकारी नौकरी से पूर्व देहरादून स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द विजुअली हेंडिकेप्ट्स (एनआईवीएच) संस्थान से इस कोर्स को पूरा किया। इसके बाद उन्होंने एक ब्लाइंड संस्था में कार्य किया। इस संस्था के माध्यम से उनका इन बच्चों से संपर्क हुआ। कुछ समय बाद ही वह सरकारी अध्यापक बन गए। लेकिन, इन बच्चों के लगाव होने के कारण वह इनसे जुड़ें रहे।
क्या कहते हैं दृष्टि बाधित
दृष्टि बाधित जाकिर हुसैन, सलीम अहमद, विक्रम सिंह और गब्बर सिंह आदि ने बताया कि उन्हें बचपन से ही अध्यापक तारकेश्वर पांडे का मार्गदर्शन मिला। उन्होंने स्कूल में दाखिला कराकर उनकी पढ़ाई कराई। उनकी मेहनत से ही सरकारी नौकरी मिली है।