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भारतीय ज्ञान प्रणाली में अध्यात्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक : डॉ. पांडे
Wed, 12 Nov 2025 01:31 AM IST
नोएडा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
Updated Wed, 12 Nov 2025 01:31 AM IST
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व्याख्यानमाला कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. गिरीश पांडेय को स्मृति चिह्न भेंट करते आयोजक। स्रो
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श्री देव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय के पं. ललित मोहन शर्मा परिसर में बीसीए विभाग की ओर से आयोजित व्याख्यानमाला के दूसरे दिन वक्ताओं ने पतंजलि के योगसूत्र और पाणिनि के अष्टाध्यायी पर चर्चा की। इस व्याख्यान का आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा उत्कृष्टता केंद्र की ओर से किया गया था।
बाबा काली कमली संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. गिरीश पांडे ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में पतंजलि के योगसूत्र और पाणिनि के अष्टाध्यायी जैसे ग्रंथ इस प्रणाली की बौद्धिक गहराई और तार्किक सुदृढ़ता के प्रतीक हैं। पाणिनि का व्याकरण न केवल भाषिक विज्ञान का सर्वोच्च उदाहरण है, बल्कि यह आज के कंप्यूटर भाषा विज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सिद्धांतों से भी साम्य रखता है।
पतंजलि का योगदर्शन भारतीय चिंतन की वह धारा है, जो आत्म संयम, साधना और मनोविज्ञान के वैज्ञानिक स्वरूप को प्रस्तुत करता है। ये ग्रंथ यह प्रमाणित करते हैं कि भारतीय ज्ञान प्रणाली में अध्यात्म और विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा के सभी स्तरों पर शामिल करना इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इससे विद्यार्थी न केवल तकनीकी रूप से दक्ष बनेंगे, बल्कि भारतीय मूल्य बोध, नैतिकता और आत्मनिष्ठा से भी सशक्त होंगे।
भारतीय ज्ञान प्रणाली के चार प्रमुख कार्यक्षेत्र ज्ञान, विज्ञान, चिंतन और आचरण मानव जीवन के सर्वांगीण विकास का आधार हैं। इस मौके पर डॉ. गौरव वार्ष्णेय, प्रो. पूनम पाठक, शिखा वार्ष्णेय, मोनिका काला, कविता, संजय तिवारी, राहुल सुयाल आदि मौजूद रहे।
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सभ्यता की आत्मा है भारतीय ज्ञान प्रणाली
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली सिर्फ एक अकादमिक विषय नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता की आत्मा है। उन्होंने कहा कि यह ज्ञान प्रणाली वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन, संगीत, वास्तुकला, योग और व्याकरण जैसे ज्ञान के विविध क्षेत्रों को एक साथ जोड़ती है।
बाबा काली कमली संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. गिरीश पांडे ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में पतंजलि के योगसूत्र और पाणिनि के अष्टाध्यायी जैसे ग्रंथ इस प्रणाली की बौद्धिक गहराई और तार्किक सुदृढ़ता के प्रतीक हैं। पाणिनि का व्याकरण न केवल भाषिक विज्ञान का सर्वोच्च उदाहरण है, बल्कि यह आज के कंप्यूटर भाषा विज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सिद्धांतों से भी साम्य रखता है।
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पतंजलि का योगदर्शन भारतीय चिंतन की वह धारा है, जो आत्म संयम, साधना और मनोविज्ञान के वैज्ञानिक स्वरूप को प्रस्तुत करता है। ये ग्रंथ यह प्रमाणित करते हैं कि भारतीय ज्ञान प्रणाली में अध्यात्म और विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा के सभी स्तरों पर शामिल करना इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इससे विद्यार्थी न केवल तकनीकी रूप से दक्ष बनेंगे, बल्कि भारतीय मूल्य बोध, नैतिकता और आत्मनिष्ठा से भी सशक्त होंगे।
भारतीय ज्ञान प्रणाली के चार प्रमुख कार्यक्षेत्र ज्ञान, विज्ञान, चिंतन और आचरण मानव जीवन के सर्वांगीण विकास का आधार हैं। इस मौके पर डॉ. गौरव वार्ष्णेय, प्रो. पूनम पाठक, शिखा वार्ष्णेय, मोनिका काला, कविता, संजय तिवारी, राहुल सुयाल आदि मौजूद रहे।
सभ्यता की आत्मा है भारतीय ज्ञान प्रणाली
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली सिर्फ एक अकादमिक विषय नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता की आत्मा है। उन्होंने कहा कि यह ज्ञान प्रणाली वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन, संगीत, वास्तुकला, योग और व्याकरण जैसे ज्ञान के विविध क्षेत्रों को एक साथ जोड़ती है।