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24 फर्जी कंपनियों का पंजीयन निरस्त
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24 फर्जी कंपनियों का पंजीयन निरस्त
नोएडा। कारोबारियों को राहत देने के लिए जीएसटी रिटर्न प्रक्रिया को आसान तो बना दिया गया, लेकिन अब यही राहत सरकार के लिए बड़ी आफत बनती जा रही है। फर्जी कंपनियां बनाकर बोगस बिलों के जरिये कर चोरी के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसी ही 24 फर्जी कंपनियों के पंजीयन वाणिज्य कर विभाग ने निरस्त कर दिए हैं। इनमें पांच कंपनियां जून में पकड़े गए 615 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े से जुड़ी बताई जा रही हैं।
जून में वाणिज्य कर विभाग की विशेष अनुसंधान शाखा और एसटीएफ ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए फर्जी कंपनियों के बड़े सिंडिकेट का खुलासा किया था। इसमें चार लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी। विभाग के अतिरिक्त आयुक्त ग्रेड-2 धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि इस मामले में संलिप्त दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न पतों पर छापेमारी की गई थी जिसमें कई कंपनियों के नाम सामने आए थे, लेकिन मौके पर इनका अस्तित्व नहीं मिला था। इस मामले से जुड़ी ही पांच फर्जी कंपनियों के पंजीयन निरस्त किए गए हैं। इसके अलावा साल भर चली जांच के आधार पर 19 अन्य फर्जी कंपनियां मिली थीं इन पर कार्रवाई करते हुए उनके पंजीयन को निरस्त किया गया है। अधिकांश मामलों में फर्जी कंपनियों के बोगस बिलों के जरिये कर चोरी की बात सामने आई है। इस तरह के फर्जीवाड़े से जुड़ी अधिकांश कंपनियां लोहे, स्क्रैप, सीमेंट, स्टील आदि के कारोबार से जुड़ी हैं।
पकड़ी गई थी 238 करोड़ की धोखाधड़ी
सेंट्रल जीएसटी ने इस साल मार्च में फर्जी कंपनियां बनाकर बोगस बिलों के जरिये 238 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले का खुलासा किया था। इसमें दिल्ली में रहने वाले दो भाइयों ने कई जगह अपने व रिश्तेदारों के नाम से करीब 70 फर्जी कंपनियों का पंजीयन कराकर देश के अलग-अलग राज्यों में स्थित फर्मों से सिर्फ कागजों में कारोबार कर डाला। नकली बिल बनाकर 1681.61 करोड़ रुपये के माल की आपूर्ति दिखाई गई। जांच के आधार आईटीसी के रूप में 238 करोड़ की धोखाधड़ी सामने आ चुकी थी।
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इसलिए भी बढ़ गया फर्जीवाड़ा
टैक्स विशेषज्ञों के मुताबिक पहले जीएसटीआर-2 व जीएसटीआर-3 भरने का नियम था, लेकिन कारोबारियों ने इस प्रक्रिया को जटिल बताते हुए इसमें बदलाव की मांग उठाई थी। जीएसटीआर-2 में महीनेभर की सारी खरीदारियों का ब्योरा देना होता था जबकि जीएसटीआर-3 में मासिक बिक्री और खरीदारियों का संक्षिप्त ब्योरा देना होता था। इन दोनों के आधार पर यह तय होता था कि संबंधित कंपनी या फर्म पर कितने कर की देनदारी है। जीएसटीआर-2 व 3 को निलंबित कर दिया गया, जिसके बाद फर्जीवाड़े की संभावनाएं ज्यादा बढ़ गई हैं। रोज इस तरह के नए खुलासे हो रहे हैं। बोगस बिलों के जरिये कागजों में कारोबार दिखाकर आईटीसी क्लेम का लाभ लेने वाले कई मामले अब तक सामने आ चुके हैं।
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नोएडा। कारोबारियों को राहत देने के लिए जीएसटी रिटर्न प्रक्रिया को आसान तो बना दिया गया, लेकिन अब यही राहत सरकार के लिए बड़ी आफत बनती जा रही है। फर्जी कंपनियां बनाकर बोगस बिलों के जरिये कर चोरी के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसी ही 24 फर्जी कंपनियों के पंजीयन वाणिज्य कर विभाग ने निरस्त कर दिए हैं। इनमें पांच कंपनियां जून में पकड़े गए 615 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े से जुड़ी बताई जा रही हैं।
जून में वाणिज्य कर विभाग की विशेष अनुसंधान शाखा और एसटीएफ ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए फर्जी कंपनियों के बड़े सिंडिकेट का खुलासा किया था। इसमें चार लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी। विभाग के अतिरिक्त आयुक्त ग्रेड-2 धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि इस मामले में संलिप्त दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न पतों पर छापेमारी की गई थी जिसमें कई कंपनियों के नाम सामने आए थे, लेकिन मौके पर इनका अस्तित्व नहीं मिला था। इस मामले से जुड़ी ही पांच फर्जी कंपनियों के पंजीयन निरस्त किए गए हैं। इसके अलावा साल भर चली जांच के आधार पर 19 अन्य फर्जी कंपनियां मिली थीं इन पर कार्रवाई करते हुए उनके पंजीयन को निरस्त किया गया है। अधिकांश मामलों में फर्जी कंपनियों के बोगस बिलों के जरिये कर चोरी की बात सामने आई है। इस तरह के फर्जीवाड़े से जुड़ी अधिकांश कंपनियां लोहे, स्क्रैप, सीमेंट, स्टील आदि के कारोबार से जुड़ी हैं।
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पकड़ी गई थी 238 करोड़ की धोखाधड़ी
सेंट्रल जीएसटी ने इस साल मार्च में फर्जी कंपनियां बनाकर बोगस बिलों के जरिये 238 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले का खुलासा किया था। इसमें दिल्ली में रहने वाले दो भाइयों ने कई जगह अपने व रिश्तेदारों के नाम से करीब 70 फर्जी कंपनियों का पंजीयन कराकर देश के अलग-अलग राज्यों में स्थित फर्मों से सिर्फ कागजों में कारोबार कर डाला। नकली बिल बनाकर 1681.61 करोड़ रुपये के माल की आपूर्ति दिखाई गई। जांच के आधार आईटीसी के रूप में 238 करोड़ की धोखाधड़ी सामने आ चुकी थी।
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इसलिए भी बढ़ गया फर्जीवाड़ा
टैक्स विशेषज्ञों के मुताबिक पहले जीएसटीआर-2 व जीएसटीआर-3 भरने का नियम था, लेकिन कारोबारियों ने इस प्रक्रिया को जटिल बताते हुए इसमें बदलाव की मांग उठाई थी। जीएसटीआर-2 में महीनेभर की सारी खरीदारियों का ब्योरा देना होता था जबकि जीएसटीआर-3 में मासिक बिक्री और खरीदारियों का संक्षिप्त ब्योरा देना होता था। इन दोनों के आधार पर यह तय होता था कि संबंधित कंपनी या फर्म पर कितने कर की देनदारी है। जीएसटीआर-2 व 3 को निलंबित कर दिया गया, जिसके बाद फर्जीवाड़े की संभावनाएं ज्यादा बढ़ गई हैं। रोज इस तरह के नए खुलासे हो रहे हैं। बोगस बिलों के जरिये कागजों में कारोबार दिखाकर आईटीसी क्लेम का लाभ लेने वाले कई मामले अब तक सामने आ चुके हैं।