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Noida News: एम्स सहित नामी अस्पतालों के डॉक्टर बनकर दे रहे गलत जानकारी

Sun, 04 May 2025 07:50 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sun, 04 May 2025 07:50 PM IST
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posing as doctors of reputed hospitals including AIIMS
- एम्स प्रशासन के सामने आया मामला, होगी कानूनी कार्रवाई
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। एम्स, सफदरजंग, डॉ. राम मनोहर लोहिया सहित बड़े अस्पतालों के फर्जी डॉक्टर बनकर कुछ लोग गलत जानकारी सोशल मीडिया पर दे रहे है। यह लोग अस्पताल प्रशासन के फैसले, शोध, सरकार के फैसले सहित अन्य पर सवाल उठाते हैं। साथ ही एक विशेष विषय को लेकर एजेंडा चलाते हैं।
ऐसा ही एक मामला एम्स में आया है। एम्स के मीडिया प्रभारी प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा ने बताया कि अस्पताल के संज्ञान में आया है कि डॉ. नमित सिंह नामक कोई व्यक्ति खुद को एम्स का डॉक्टर बताकर सोशल मीडिया पर सूचनाएं दे रहा है। जांच के दौरान यह अस्पताल का स्टाफ नहीं मिला। डॉ. नमित सिंह का एम्स नई दिल्ली से कोई संबंध नहीं है। एम्स, नई दिल्ली के निदेशक कार्यालय के नाम से उन्होंने जो भी पत्र प्रसारित किया है, वह पूरी तरह से फर्जी और अनधिकृत है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से दिए गए उनके बयान और टिप्पणियां भी पूरी तरह से गलत है। उन्होंने कहा कि संस्थान ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगा।
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हो सकते हैं ठगी के शिकार
एम्स के एक डॉक्टर ने बताया कि अस्पताल में 300 रुपये तक की सभी जांच मुफ्त में होती है, लेकिन देखा गया है कि कुछ लोग गलत सूचना देते हैं कि यह मुफ्त जांच की सुविधा बंद हो गई। इसके अलावा सामान्य वार्ड में लंबे समय के लिए भर्ती होने पर करीब 375 रुपये लिए जाते हैं। जबकि इसी सुविधा के लिए मरीज हजारों रुपये लेने का दावा करते हैं। एम्स में रोजाना करीब 15 हजार मरीज ओपीडी में आते हैं। इनमें से अधिकतर मरीजों की जांच होती है। ऐसे में यदि किसी मरीज के पास गलत सूचना होगी तो वह मुफ्त सुविधा के लिए भी पैसे देकर ठगी का शिकार हो सकता है।
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सोशल मीडिया की जानकारी को सच मान लेते हैं मरीज
डॉक्टरों ने बताया कि दिल्ली के अलग-अलग अस्पताल में आने वाले काफी मरीज कम पढ़े लिखे होते हैं। यह मरीज सोशल मीडिया की जानकारी आसानी से सही मान लेते हैं। सफदरजंग इमरजेंसी से जुड़े डॉक्टरों का कहना है कि कई बार ऐसे मरीज और उनके तीमारदार आते हैं जो रात में कमरा दिलाने के नाम पर पैसे देने की बात करते हैं। जबकि अस्पताल में ऐसी कोई सुविधा नहीं। जब उनसे इस सूचना का सूत्र पूछते हैं तो सोशल मीडिया का हवाला देते हैं।
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