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तानों से ट्रॉफी तक: नोएडा की पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी चरणजीत कौर ने जीता देश का दिल, ब्रॉन्ज मेडल जीत टॉप तीन में
Sat, 14 Mar 2026 11:29 AM IST
अनुज कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, नोएडा
अमर उजाला नेटवर्क, नोएडा
Published by: अनुज कुमार
Updated Sat, 14 Mar 2026 11:29 AM IST
सार
Noida Para-Badminton Star Charanjit Kaur: नोएडा की पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी चरणजीत कौर ने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर टॉप तीन में जगह बनाई। हैदराबाद में आयोजित 7वीं पैरा सीनियर नेशनल बैडमिंटन चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन किया।
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नोएडा की पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी चरणजीत कौर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कभी समाज के ताने और दिव्यांगता की चुनौतियों से जूझने वाली नोएडा की पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी चरणजीत कौर ने आज अपने दम पर जिले और देश का नाम रोशन किया है। हैदराबाद (तेलंगाना) स्थित हर्टफुलनेस गोपीचंद एकेडमी में आयोजित 7वीं पैरा सीनियर नेशनल बैडमिंटन चैंपियनशिप में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीतकर टॉप तीन खिलाड़ियों में जगह बनाई। यह प्रतियोगिता 7 से 10 मार्च तक आयोजित हुई, जिसमें देशभर से करीब 800 खिलाड़ियों ने भाग लिया था।
40 वर्षीय चरणजीत कौर बताती हैं कि इस मुकाम तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। जब उन्होंने इस प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई किया, तब उन्हें खुद भी उम्मीद नहीं थी कि वह मेडल तक पहुंच जाएंगी। लेकिन लगातार मेहनत, अभ्यास और खुद पर भरोसे ने उन्हें यहां तक पहुंचाया।
चरणजीत बचपन से ही पोलियो से पीड़ित हैं। उनका जन्म पटियाला के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ और वह तीन बहनों में से एक हैं। एक पैर से चलने में परेशानी के कारण बचपन से ही उन्हें कई तरह की मुश्किलों और सामाजिक तानों का सामना करना पड़ा। परिवार को उनकी शादी की चिंता रहती थी और समाज में लोग कहते थे कि “ऐसी लड़की से कौन शादी करेगा?” खेल में जाने की बात पर भी उन्हें यह सुनना पड़ा कि “खेलोगी तो छोटे कपड़े पहनने पड़ेंगे।”
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लेकिन चरणजीत ने इन तानों को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत बना लिया। 22 साल की उम्र में उन्होंने बैडमिंटन खेलना शुरू किया और इसे सिर्फ खेल नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की लड़ाई बना लिया। उनकी मेहनत का परिणाम यह रहा कि 2007 में उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। अब तक वह 20 से ज्यादा नेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुकी हैं और कई खिताब अपने नाम कर चुकी हैं। इसके अलावा 14 इंटरनेशनल टूर्नामेंट में भी वह देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं, जिनमें दो गोल्ड सहित कई सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं।
हालांकि उनका सपना अभी भी अधूरा है। चरणजीत कहती हैं कि उनका लक्ष्य पैरा ओलंपिक में देश के लिए खेलना है। लेकिन इसके लिए अलग-अलग देशों में टूर्नामेंट खेलने पड़ते हैं और पॉइंट्स जुटाने के लिए काफी खर्च आता है। आर्थिक सहयोग की कमी कई बार उनके जैसे खिलाड़ियों के लिए बड़ी बाधा बन जाती है।
2008 में शादी के बाद वह एक मां, पत्नी और खिलाड़ी तीनों जिम्मेदारियां निभा रही हैं। चरणजीत का मानना है कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी मुश्किल रास्ता नहीं रोक सकती। वह कहती हैं, “हर महिला को अपनी पहचान बनानी चाहिए, चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों।
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40 वर्षीय चरणजीत कौर बताती हैं कि इस मुकाम तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। जब उन्होंने इस प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई किया, तब उन्हें खुद भी उम्मीद नहीं थी कि वह मेडल तक पहुंच जाएंगी। लेकिन लगातार मेहनत, अभ्यास और खुद पर भरोसे ने उन्हें यहां तक पहुंचाया।
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चरणजीत बचपन से ही पोलियो से पीड़ित हैं। उनका जन्म पटियाला के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ और वह तीन बहनों में से एक हैं। एक पैर से चलने में परेशानी के कारण बचपन से ही उन्हें कई तरह की मुश्किलों और सामाजिक तानों का सामना करना पड़ा। परिवार को उनकी शादी की चिंता रहती थी और समाज में लोग कहते थे कि “ऐसी लड़की से कौन शादी करेगा?” खेल में जाने की बात पर भी उन्हें यह सुनना पड़ा कि “खेलोगी तो छोटे कपड़े पहनने पड़ेंगे।”
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लेकिन चरणजीत ने इन तानों को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत बना लिया। 22 साल की उम्र में उन्होंने बैडमिंटन खेलना शुरू किया और इसे सिर्फ खेल नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की लड़ाई बना लिया। उनकी मेहनत का परिणाम यह रहा कि 2007 में उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। अब तक वह 20 से ज्यादा नेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुकी हैं और कई खिताब अपने नाम कर चुकी हैं। इसके अलावा 14 इंटरनेशनल टूर्नामेंट में भी वह देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं, जिनमें दो गोल्ड सहित कई सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं।
हालांकि उनका सपना अभी भी अधूरा है। चरणजीत कहती हैं कि उनका लक्ष्य पैरा ओलंपिक में देश के लिए खेलना है। लेकिन इसके लिए अलग-अलग देशों में टूर्नामेंट खेलने पड़ते हैं और पॉइंट्स जुटाने के लिए काफी खर्च आता है। आर्थिक सहयोग की कमी कई बार उनके जैसे खिलाड़ियों के लिए बड़ी बाधा बन जाती है।
2008 में शादी के बाद वह एक मां, पत्नी और खिलाड़ी तीनों जिम्मेदारियां निभा रही हैं। चरणजीत का मानना है कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी मुश्किल रास्ता नहीं रोक सकती। वह कहती हैं, “हर महिला को अपनी पहचान बनानी चाहिए, चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों।