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Noida News: खुद तैयार की मिट्टी और गोबर से भगवान की मूर्तियां, गमलों व टब में विसर्जन कर देंगे पर्यावरण का संदेश

Wed, 11 Sep 2024 08:39 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 11 Sep 2024 08:39 PM IST
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Idols of God prepared from self prepared soil and cow dung, will immerse in pots to give message of environment.
मूर्तियों को बनाते समय कई प्रकार के पौधों के बीज डाले जाएंगे, ताकि विसर्जन के बाद भी साथ रहे बाप्पा
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संवाद न्यूज एजेंसी
नोएडा। पर्यावरण संरक्षण को संजोने के लिए शहर के कुछ लोगों ने घरों में ही मिट्टी और गाय के गोबर से भगवान की मूर्तियां तैयार कर अपने घरों में स्थापित की है। इन मूर्तियों को गमलों और टब में विसर्जन किया जाएगा। ताकि नदी को प्रदूषित होने से बचाया जा सके। इसके साथ ही इन मूर्तियों को बनाते समय कई प्रकार के पौधों के बीज इनमें डाले गए हैं। ताकि विसर्जन के बाद पौधों के रूप में गणपति भक्तों के साथ मौजूद रहे।
सेक्टर- 1 रहने वाली ऐश्वर्या ने मिट्टी, गाय का गोबर और वेस्ट पेपर आदि से खुद भगवान गणेश की मूर्ति बनाई है। उन्होंने बताया कि मिट्टी और गोबर आदि से बनी मूर्तिओं में छायादार और फलदार पौधों के बीज भी डाले जाते हैं। जब इनको टब या गमलों में विसर्जन किया जाता है तो वह पौधों का रूप ले लेते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले आठ साल से वह खुद मूर्तियां बनाकर स्थापित कर रही हैं। उन मूर्तिओं की निशानी अब उनके घर में लगे आम, आंवला, नीम, गुड़हल, बेल, तुलसी, जामुन आदि के पौधे हैं। ऐश्वर्या कहती हैं कि ईश्वर में आस्था के साथ अगर लोग पर्यावरण का भी ध्यान रखें तो ईश्वर ज्यादा प्रसन्न होंगे। सेक्टर-12 निवासी प्रियंका कहती हैं कि घर में रखे गमले की मिट्टी से पहले गणेशजी की मूर्ति बनाते हैं। इसके बाद उन्हें विसर्जित कर मिट्टी को पुन गमले में भरकर पौधा लगा देते हैं। इससे आस्था बनी रहती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता।
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आस्था भी बनी रहे और पर्यावरण को नुकसान भी न हो
सेक्टर- 12 निवासी प्रियंका प्रजापति दो साल से मिट्टी से भगवान गणेश की मूर्ति बना रही हैं। उन्होंने बताया मिट्टी के गणेशजी बनाने में सभी को आगे आना चाहिए। लोग अपने आप मूर्तियों को बनाएंगे तो उनके भाव भी दूसरे होंगे। इसके साथ ही उन्हें यह भी पता होगा कि मूर्ति को कैसे तैयार किया जाए कि पर्यावरण को कोई नुकसान न हो और आस्था भी बनी रहे। कई लोग मूर्ति स्थापना के बाद उन्हें नदी में विसर्जन के लिए ले जाते हैं। ऐसे में नदी तो प्रदूषित होती ही है।
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