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Noida News: दुष्कर्म पीड़िताओं के गर्भपात संबंधी दिशा-निर्देश जारी

Mon, 02 Jun 2025 06:56 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 02 Jun 2025 06:56 PM IST
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Guidelines issued regarding abortion for rape victims
-17 वर्षीय पीड़िता के मामले में सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न या बलात्कार की शिकार महिलाओं और नाबालिगों के लिए मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (गर्भपात) से संबंधित महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने यह फैसला एक 17 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
याचिका में कहा गया है कि पीड़िता को एम्स में उपचार के दौरान कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। 17 वर्षीय पीड़िता को वहां अल्ट्रासाउंड के लिए पहचान पत्र न होने के कारण मना कर दिया गया, भले ही पुलिस उसके साथ थी। 13 दिन की देरी के बाद अल्ट्रासाउंड में पता चला कि वह 25 सप्ताह से अधिक की गर्भवती थी। इसके बाद डॉक्टरों ने कहा कि गर्भावस्था की अवधि वैधानिक सीमा से अधिक होने के कारण कोर्ट का आदेश आवश्यक है। हालांकि, कोर्ट के आदेश पर मेडिकल बोर्ड ने जांच की और पाया कि पीड़िता केवल 24 सप्ताह की गर्भवती थी। ऐसे में कोर्ट के आदेश की कोई आवश्यकता नहीं थी। कोर्ट ने एम्स के इस रवैये को चिंताजनक बताया। जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस तरह की लापरवाही पीड़िता के अधिकारों का उल्लंघन करती है।
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अदालत ने यह निर्देश किए जारी

-दुष्कर्म या यौन उत्पीड़न पीड़िता के गर्भवती होने का पता चलते ही बिना किसी देरी के व्यापक चिकित्सा जांच की जाए।
-जांच अधिकारी की जिम्मेदारी होगी कि वह पीड़िता की पहचान सुनिश्चित करे और मेडिकल बोर्ड के समक्ष उसे पेश करते समय आवश्यक दस्तावेज और केस फाइल साथ लाए।
-यदि जांच अधिकारी पीड़िता (नाबालिग या वयस्क) को साथ लाता है या कोर्ट अथवा बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के निर्देश पर पेश किया जाता है तो अस्पताल या डॉक्टर पीड़िता से पहचान पत्र की मांग नहीं कर सकते।
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4. यदि गर्भावस्था की अवधि 24 सप्ताह से अधिक है तो मेडिकल बोर्ड को बिना किसी अदालती आदेश की प्रतीक्षा के तुरंत गठित किया जाए।
5. दुष्कर्म पीड़िता के एमटीपी के सभी मामलों में भ्रूण को उचित रूप से संरक्षित किया जाए, ताकि भविष्य में डीएनए विश्लेषण या अन्य फोरेंसिक उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग किया जा सके।

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फैसले की प्रति पुलिस आयुक्त व सरकार को भेजने को कहा
कोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति दिल्ली हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी, दिल्ली पुलिस आयुक्त, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार को भेजी जाए, ताकि सभी संबंधित पक्षों तक दिशानिर्देश पहुंचें और उनका पालन सुनिश्चित हो। साथ ही, इस फैसले को हिंदी में अनुवाद कर कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने का भी निर्देश दिया गया।
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