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अखलाक मॉब लिंचिंग केस: आरोपियों ने दूसरे न्यायालय में स्थानांतरण की मांग की
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(अदालत से)
-आरोपियों के अधिवक्ता ने फास्ट ट्रैक कोर्ट के 23 दिसंबर-2025 के आदेश को हाईकोर्ट में दी चुनौती
-फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफटीसी-1) के एडीजे ने मामले की सुनवाई 23 जनवरी तक की स्थगित
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। अखलाक मॉब लिचिंग के मामले में आरोपियों ने मामले को किसी अन्य न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की है। गुरुवार को आरोपियों के अधिवक्ताओं ने फास्ट ट्रैक कोर्ट को अवगत कराया कि उन्होंने अभियोजन पक्ष द्वारा केस वापस लेने की अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी है। साथ ही मामले के दूसरी अदालत में स्थानांतरण के लिए आवेदन जनपद न्यायाधीश की अदालत में दाखिल किया है। आदेश आने तक मामले में गवाही नहीं कराई जाए। इस पर सूरजपुर स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफटीसी-1) के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) सौरभ द्विवेदी ने सुनवाई करते हुए मामले की अगली तारीख 23 जनवरी तय की और सुनवाई को 15 दिन के लिए स्थगित कर दिया। अदालत ने कहा कि स्थानांतरण आवेदन लंबित रहने के दौरान वह इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकती।
एडीजे सौरभ द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब तक जिला जज के समक्ष स्थानांतरण प्रार्थना पत्र लंबित है। तब तक संबंधित अदालत को मामले में आगे की कार्यवाही रोकनी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी पक्षकार को अपने मुकदमे को दूसरी अदालत में स्थानांतरित कराने का अधिकार है। इसके साथ ही अदालत ने इस केस को अत्यंत महत्वपूर्ण श्रेणी में रखते हुए इसे फास्ट ट्रैक करने और रोजाना सुनवाई के निर्देश दिए थे। इस आदेश के बाद पहली सुनवाई 6 जनवरी को हुई थी।
आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता देवेंद्र राहुल चौधरी और नीरज सिंह तंवर ने अदालत को बताया कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के 23 दिसंबर के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। साथ ही मामले को दूसरी अदालत में स्थानातंरण के लिए जनपद न्यायाधीश की अदालत में आवेदन कर रखा है। जिला न्यायाधीश अब तय करेंगे कि मामले की सुनवाई किस अदालत में होगी।
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वहीं मृतक अखलाक की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अंदलीब नकवी और युसुफ सैफी ने आरोपियों की दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह कोई निजी मामला नहीं है। राज्य सरकार ऐसा व्यवहार कर रही है मानो वह आरोपियों की वकील हो। गुरुवार की सुनवाई के दौरान अखलाक की पत्नी इकरामन भी अदालत में मौजूद रहीं, लेकिन उनका बयान दर्ज नहीं हो सका।
वृंदा करात ने जुगलबंदी का लगाया आरोप: सुनवाई के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सीपीआईएम की नेता वृंदा करात भी मौजूद रहीं। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष के सरकारी अधिवक्ता को पीड़ित पक्ष के साथ खड़ा होना चाहिए था। मगर सुनवाई के दौरान अभियोजन अधिवक्ता और आरोपियों के अधिवक्ता के बीच जुगलबंदी दिखाई दी। यह न्याय का मजाक है।
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-आरोपियों के अधिवक्ता ने फास्ट ट्रैक कोर्ट के 23 दिसंबर-2025 के आदेश को हाईकोर्ट में दी चुनौती
-फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफटीसी-1) के एडीजे ने मामले की सुनवाई 23 जनवरी तक की स्थगित
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। अखलाक मॉब लिचिंग के मामले में आरोपियों ने मामले को किसी अन्य न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की है। गुरुवार को आरोपियों के अधिवक्ताओं ने फास्ट ट्रैक कोर्ट को अवगत कराया कि उन्होंने अभियोजन पक्ष द्वारा केस वापस लेने की अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी है। साथ ही मामले के दूसरी अदालत में स्थानांतरण के लिए आवेदन जनपद न्यायाधीश की अदालत में दाखिल किया है। आदेश आने तक मामले में गवाही नहीं कराई जाए। इस पर सूरजपुर स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफटीसी-1) के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) सौरभ द्विवेदी ने सुनवाई करते हुए मामले की अगली तारीख 23 जनवरी तय की और सुनवाई को 15 दिन के लिए स्थगित कर दिया। अदालत ने कहा कि स्थानांतरण आवेदन लंबित रहने के दौरान वह इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकती।
एडीजे सौरभ द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब तक जिला जज के समक्ष स्थानांतरण प्रार्थना पत्र लंबित है। तब तक संबंधित अदालत को मामले में आगे की कार्यवाही रोकनी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी पक्षकार को अपने मुकदमे को दूसरी अदालत में स्थानांतरित कराने का अधिकार है। इसके साथ ही अदालत ने इस केस को अत्यंत महत्वपूर्ण श्रेणी में रखते हुए इसे फास्ट ट्रैक करने और रोजाना सुनवाई के निर्देश दिए थे। इस आदेश के बाद पहली सुनवाई 6 जनवरी को हुई थी।
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आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता देवेंद्र राहुल चौधरी और नीरज सिंह तंवर ने अदालत को बताया कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के 23 दिसंबर के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। साथ ही मामले को दूसरी अदालत में स्थानातंरण के लिए जनपद न्यायाधीश की अदालत में आवेदन कर रखा है। जिला न्यायाधीश अब तय करेंगे कि मामले की सुनवाई किस अदालत में होगी।
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वहीं मृतक अखलाक की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अंदलीब नकवी और युसुफ सैफी ने आरोपियों की दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह कोई निजी मामला नहीं है। राज्य सरकार ऐसा व्यवहार कर रही है मानो वह आरोपियों की वकील हो। गुरुवार की सुनवाई के दौरान अखलाक की पत्नी इकरामन भी अदालत में मौजूद रहीं, लेकिन उनका बयान दर्ज नहीं हो सका।
वृंदा करात ने जुगलबंदी का लगाया आरोप: सुनवाई के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सीपीआईएम की नेता वृंदा करात भी मौजूद रहीं। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष के सरकारी अधिवक्ता को पीड़ित पक्ष के साथ खड़ा होना चाहिए था। मगर सुनवाई के दौरान अभियोजन अधिवक्ता और आरोपियों के अधिवक्ता के बीच जुगलबंदी दिखाई दी। यह न्याय का मजाक है।