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चिटहेरा भूमि प्रकरण: वर्ष 1997 में शुरू हुआ घोटाला 2020 तक रहा जारी

Mon, 16 May 2022 01:42 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 16 May 2022 01:42 AM IST
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Chithera land case: The scam that started in the year 1997 continued till 2020
ग्रेटर नोएडा (नवीन कुमार)। अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की 1000 पेज की रिपोर्ट चिटहेरा भूमि घोटाले के हर राज खोलेगी। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि वर्ष 1997 में पट्टों के आवंटन के साथ ही घोटाले का खेल शुरू हुआ था जो वर्ष 2020 तक चला। वर्ष 2020 में मेरठ के अपर आयुक्त की कोर्ट ने पट्टों को बहाल करने के आदेश के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया था। इस बीच पट्टों का आवंटन और क्रय-विक्रय गलत हुआ। सभी अफसरों को इसकी जानकारी थी, लेकिन किसी ने कार्रवाई नहीं की।
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तहसील दादरी के तत्कालीन एसडीएम ने वर्ष 1997 में चिटहेरा गांव में 282 पट्टों का गलत तरीके से आवंटन किया था। इसका विरोध शुरू होने पर एसडीएम ने अपात्र बताकर 75 पट्टों का आवंटन स्वयं निरस्त कर दिया। इस आदेश को अपर आयुक्त मेरठ के यहां चुनौती दी गई तो अपर आयुक्त ने एसडीएम को सचेत किया। न्यायिक जानकारी नहीं होने की रिपोर्ट शासन को भी भेजी। इस बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पास पट्टों के गलत आवंटन की शिकायत पहुंच गई। इस पर उन्होंने जांच का आदेश दिया। साथ ही, दोषी अफसरों के खिलाफ चार्जशीट मांगी। आदेश पर तत्कालीन एसडीएम मांगेराम धीमान ने विस्तृत जांच की।
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सरकारी नौकर व गाड़ी मालिक को दिया पट्टा
मांगेराम धीमान की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पट्टों का आवंटन गलत किया गया। 282 में से केवल 78 पात्र मिले। बाकी सभी लाभार्थियों में कोई कोटेदार तो कोई ग्राम प्रधान के परिवार का सदस्य था। इनके अलावा अन्य जनपदों में रहने वाले लोगों के नाम पट्टों का आवंटन किया गया। इनमें कई लोगों की सरकारी नौकरी थी। एक घर में ही कई लोगों के नाम पट्टे किए गए। पट्टा धारकों के पास गाड़ी और मकान भी थे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि गांव में अनुसूचित जाति के पात्र लोग भी थे, लेकिन उन्हें पट्टों का आवंटन नहीं किया गया। यह रिपोर्ट शासन को भी भेजी गई थी।
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एडीएम की कोर्ट ने कर दिया था निरस्त
वर्ष 2000 में पट्टों के आवंटन का केस जिलाधिकारी गौतमबुद्ध नगर की कोर्ट में पहुंचा। वहां से अपर जिलाधिकारी (भूअधिपत्य) की कोर्ट में मामला पहुंच गया। वर्ष 2004 में एडीएम कोर्ट ने सभी पट्टों का आवंटन निरस्त कर दिया। पुनर्विचार अपील को भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद अपर आयुक्त मेरठ के पास केस पहुंचा। वहां से डीएम हापुड और फिर एडीएम हापुड की कोर्ट में केस पहुंचा।
चार माह में तेजी से हुआ खेल
अगस्त, 2015 में एडीएम हापुड़ की कोर्ट में केस पहुंचा। उन्होंने दादरी तहसील के तहसीलदार से रिपोर्ट मांगी। तहसीलदार ने तत्काल रिपोर्ट प्रस्तुत की। सितंबर, 2015 में एडीएम कोर्ट ने 111 पट्टों को बहाल कर दिया, जबकि 52 पट्टों पर कब्जा नहीं था। इस पर एसडीएम से रिपोर्ट मांगी। आदेश आने के अगले अक्तूबर में पट्टा धारकों के नाम दर्ज कर दिए गए जो मर चुके थे। उनके वारिसान के भी नाम दर्ज कर दिए गए। दिसंबर तक भूमि को असंक्रमणीय से संक्रमणीय कर दिया गया। साथ ही, 52 में से 30 पट्टों पर कब्जा भी ले लिया गया, जबकि पहली रिपोर्ट में तहसील टीम को कब्जा नहीं मिल रहा था। इसके बाद वर्ष 2017 तक जमीन का मुआवजा उठा लिया गया।
छह माह तक यथास्थिति के आदेश को दबाया
अपर आयुक्त मेरठ के यहां एडीएम हापुड के आदेश का चुनौती दी गई। 26 नवंबर, 2017 को अपर आयुक्त ने उस पर यथास्थिति का आदेश जारी किया। दादरी तहसील की टीम ने उस आदेश का पालन अप्रैल, 2018 में किया। तब तक आदेश को दबाए रखा, लेकिन वर्ष 2020 में अपर आयुक्त ने यथास्थिति का आदेश हटाकर अपील खारिज कर दी।

सभी पर की है कार्रवाई की सिफारिश
अपर जिलाधिकारी वंदिता श्रीवास्तव ने अपनी जांच रिपोर्ट में इन सभी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। आरोप है कि इन सभी ने भूमाफिया का साथ देने के साथ-साथ राज्य सरकार को राजस्व का नुकसान पहुंचाने का काम किया है।
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