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कोरोना के खिलाफ जंग में बीसीजी टीका कारगर
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नोएडा। बच्चों को टीबी के उपचार के लिए लगाए जाने वाला बीसीजी टीका कोरोना के इलाज में कारगर साबित हुआ है। सेक्टर-39 स्थित कोविड अस्पताल की चिकित्सा अधीक्षक (एमएस) व जिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. रेनू अग्रवाल द्वारा कराए गए अध्ययन के ऐसे परिणाम आए हैं। एमएस ने जिला अस्पताल और कोविड अस्पताल में दो चरणों में दो-दो समूह बनाकर 210 स्वास्थ्य कर्मियों (चिकित्सक व पैरामेडिकल स्टाफ) पर अध्ययन किया। अध्ययन के नतीजों के मुताबिक, जिनको बीसीजी टीका लगा उनमें से किसी को संक्रमण नहीं हुआ। जबकि जिन्हें वैक्सीन नहीं दी गई उनमें से 36 लोग वायरस की चपेट में आ गए। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘इंडियन जर्नल ऑफ एप्लाइड रिसर्च’ के 4 नवंबर के अंक में प्रकाशित हुआ है। शासन को भी अध्ययन से अवगत करा दिया गया है। हालांकि एमएस ने यह स्पष्ट किया कि कर्मियों पर परिणाम सकारात्मक रहे हैं। हालांकि आमलोगों पर इसका क्या असर होगा इस बाबत अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है।
पहले चरण में 80 और दूसरे चरण में 130 कर्मियों का अध्ययन
एक मई को 80 कर्मचारियों का एक समूह बनाया गया। समूह में 30 लोगों को बीसीजी का टीका लगाया। दूसरा समूह 50 कर्मियों का था। इनमें से किसी को टीका नहीं लगाया गया। दोनों समूहों को जिला अस्पताल में ड्यूटी कराई गई। सभी कर्मी कोरोना संक्रमितों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष संपर्क में रहे। इन सभी कर्मचारियों की हर 15वें दिन आरटी-पीसीआर जांच की गई। करीब एक माह बाद जिन 50 कर्मचारियों को टीका नहीं लगा था, उनमें 16 संक्रमित मिले। जबकि 30 में आजतक किसी को संक्रमण नहीं हुआ। इसके बाद 24 अगस्त को 130 कर्मचारियों के समूह में 50 को टीका लगा और 80 कर्मचारियों को बिना टीका लगाए निगरानी में रखा गया। जिन्हें टीका लगा उन्हें कोरोना नहीं हुआ, जबकि बिना टीके वाले 80 में से 20 संक्रमण की चपेट में आ गए। एमएस का दावा है कि उन्होंने खुद को भी टीका लगवाया। वह अभी तक संक्रमित नहीं हुई है।
बीसीजी टीके पर ही अध्ययन क्यों?
एमएस ने बताया कि इंग्लैंड, इटली, जर्मनी और अमेरिका समेत कई देशों में बीसीजी टीके के सकारात्मक प्रभाव सामने आए। कोरोना संक्रमण फैलने के साथ ही वह लगातार बीसीजी टीके के प्रभाव का लगातार अध्ययन कर रहीं थी। बाद में तय किया कि जिला और कोविड अस्पताल में स्वास्थ्य कर्मियों पर बीसीजी टीका लगाकर अध्ययन किया जाए। इसके लिए शासन से अनुमति ली गई थी। उन्होंने बताया कि यह प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करता है। इस कारण मरीज कोरोना की चपेट में नहीं आ पाता। लेकिन कई मरीजों में प्रतिरोधक तंत्र मजबूत होने में करीब एक माह तक का वक्त लग जाता है।
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5 में दिखे लक्षण, वह भी संक्रमित नहीं निकले
एमएस ने बताया कि उम्र के हिसाब से स्वास्थ्य कर्मियों को 4 श्रेणियों में बांटा गया। इनमें 21 से 30 वर्ष, 31 से 40, 41 से 51 और 51 से 60 वर्ष शामिल रहे। पहले चरण में जिन 30 को टीका लगा। उसमें 51 से 60 साल के उम्र के स्वास्थ्य कर्मी में लक्षण दिखे, लेकिन जांच कराने पर रिपोर्ट निगेटिव आई । वहीं, जिनको टीका नहीं लगा उनमें 21 से 30 वर्ष के एक, 31 से 40 वर्ष के बीच के 4, 41 से 50 वर्ष के बीच के 2, 51 से 60 वर्ष के एक व्यक्ति में कोरोना जैसे लक्षण दिखे। लक्षण दिखने वाले कुल 8 रहे। जब इनकी आरटीपीसीआर जांच कराई तो 8 में से 7 में कोरोना की पुष्टि हुई। वहीं 24 अगस्त से शुरू हुए दूसरे चरण में 50 में से 31 से 40 वर्ष के बीच के 4 स्वास्थ्य कर्मियों में ही लक्षण दिखे। कोरोना जांच कराने पर सभी निगेटिव मिले। वहीं, बिना टीके वाले 80 कर्मियों में से 21 से 30 वर्ष के 4, 31 से 40 वर्ष के 8, 41 से 50 वर्ष के 2, 51 से 60 वर्ष के 6 कर्मियों में लक्षण दिखे। कुल 20 कर्मी लक्षण वाले रहे। सभी 20 की जांच कराने पर 19 की आरटीपीसीआर रिपोर्ट पॉजिटिव आई। वहीं बिना टीके वाले समूह में इस दौरान एक व्यक्ति बिना लक्षण वाला भी संक्रमित मिला।
अन्य बीमारियों से भी ग्रसित थे कर्मी
एमएस ने बताया कि 50 फीसदी कर्मी हाइपरटेंशन, बीपी, हृदय व अन्य बीमारियों से ग्रसित थे। बावजूद इसके कोरोना उन्हें नहीं सका। हालांकि बिना टीके वाले समूह में भी ऐसे मरीज थे। लेकिन उनमें से काफी चपेट में आ गए।
---
समूह- 1
उम्र लगा टीका टीका नहीं लगा
21-30 2 4
31-40 4 4
41-50 2 4
51-60 22 38
समूह-2
उम्र लगा टीका टीका नहीं लगा
21-30 8 20
31-40 22 44
41-50 12 6
51-60 8 10
कोट
बीसीजी टीके को लेकर अन्य देशों से प्रेरणा मिली। एक मई से जिला अस्पताल व कोविड अस्पताल के कर्मियों पर अध्ययन किया जा रहा था। जिनको बीसीजी का टीका लगाया गया उनमें से किसी को कोरोना नहीं हुआ। जबकि बिना टीके वाले संक्रमण की चपेट में आ गए। पूरा लेख इंडियन जर्नल ऑफ एप्लाइड रिसर्च में प्रकाशित हुआ है।
- डॉ. रेणु अग्रवाल, सीएमएस, जिला अस्पताल
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पहले चरण में 80 और दूसरे चरण में 130 कर्मियों का अध्ययन
एक मई को 80 कर्मचारियों का एक समूह बनाया गया। समूह में 30 लोगों को बीसीजी का टीका लगाया। दूसरा समूह 50 कर्मियों का था। इनमें से किसी को टीका नहीं लगाया गया। दोनों समूहों को जिला अस्पताल में ड्यूटी कराई गई। सभी कर्मी कोरोना संक्रमितों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष संपर्क में रहे। इन सभी कर्मचारियों की हर 15वें दिन आरटी-पीसीआर जांच की गई। करीब एक माह बाद जिन 50 कर्मचारियों को टीका नहीं लगा था, उनमें 16 संक्रमित मिले। जबकि 30 में आजतक किसी को संक्रमण नहीं हुआ। इसके बाद 24 अगस्त को 130 कर्मचारियों के समूह में 50 को टीका लगा और 80 कर्मचारियों को बिना टीका लगाए निगरानी में रखा गया। जिन्हें टीका लगा उन्हें कोरोना नहीं हुआ, जबकि बिना टीके वाले 80 में से 20 संक्रमण की चपेट में आ गए। एमएस का दावा है कि उन्होंने खुद को भी टीका लगवाया। वह अभी तक संक्रमित नहीं हुई है।
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बीसीजी टीके पर ही अध्ययन क्यों?
एमएस ने बताया कि इंग्लैंड, इटली, जर्मनी और अमेरिका समेत कई देशों में बीसीजी टीके के सकारात्मक प्रभाव सामने आए। कोरोना संक्रमण फैलने के साथ ही वह लगातार बीसीजी टीके के प्रभाव का लगातार अध्ययन कर रहीं थी। बाद में तय किया कि जिला और कोविड अस्पताल में स्वास्थ्य कर्मियों पर बीसीजी टीका लगाकर अध्ययन किया जाए। इसके लिए शासन से अनुमति ली गई थी। उन्होंने बताया कि यह प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करता है। इस कारण मरीज कोरोना की चपेट में नहीं आ पाता। लेकिन कई मरीजों में प्रतिरोधक तंत्र मजबूत होने में करीब एक माह तक का वक्त लग जाता है।
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5 में दिखे लक्षण, वह भी संक्रमित नहीं निकले
एमएस ने बताया कि उम्र के हिसाब से स्वास्थ्य कर्मियों को 4 श्रेणियों में बांटा गया। इनमें 21 से 30 वर्ष, 31 से 40, 41 से 51 और 51 से 60 वर्ष शामिल रहे। पहले चरण में जिन 30 को टीका लगा। उसमें 51 से 60 साल के उम्र के स्वास्थ्य कर्मी में लक्षण दिखे, लेकिन जांच कराने पर रिपोर्ट निगेटिव आई । वहीं, जिनको टीका नहीं लगा उनमें 21 से 30 वर्ष के एक, 31 से 40 वर्ष के बीच के 4, 41 से 50 वर्ष के बीच के 2, 51 से 60 वर्ष के एक व्यक्ति में कोरोना जैसे लक्षण दिखे। लक्षण दिखने वाले कुल 8 रहे। जब इनकी आरटीपीसीआर जांच कराई तो 8 में से 7 में कोरोना की पुष्टि हुई। वहीं 24 अगस्त से शुरू हुए दूसरे चरण में 50 में से 31 से 40 वर्ष के बीच के 4 स्वास्थ्य कर्मियों में ही लक्षण दिखे। कोरोना जांच कराने पर सभी निगेटिव मिले। वहीं, बिना टीके वाले 80 कर्मियों में से 21 से 30 वर्ष के 4, 31 से 40 वर्ष के 8, 41 से 50 वर्ष के 2, 51 से 60 वर्ष के 6 कर्मियों में लक्षण दिखे। कुल 20 कर्मी लक्षण वाले रहे। सभी 20 की जांच कराने पर 19 की आरटीपीसीआर रिपोर्ट पॉजिटिव आई। वहीं बिना टीके वाले समूह में इस दौरान एक व्यक्ति बिना लक्षण वाला भी संक्रमित मिला।
अन्य बीमारियों से भी ग्रसित थे कर्मी
एमएस ने बताया कि 50 फीसदी कर्मी हाइपरटेंशन, बीपी, हृदय व अन्य बीमारियों से ग्रसित थे। बावजूद इसके कोरोना उन्हें नहीं सका। हालांकि बिना टीके वाले समूह में भी ऐसे मरीज थे। लेकिन उनमें से काफी चपेट में आ गए।
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समूह- 1
उम्र लगा टीका टीका नहीं लगा
21-30 2 4
31-40 4 4
41-50 2 4
51-60 22 38
समूह-2
उम्र लगा टीका टीका नहीं लगा
21-30 8 20
31-40 22 44
41-50 12 6
51-60 8 10
कोट
बीसीजी टीके को लेकर अन्य देशों से प्रेरणा मिली। एक मई से जिला अस्पताल व कोविड अस्पताल के कर्मियों पर अध्ययन किया जा रहा था। जिनको बीसीजी का टीका लगाया गया उनमें से किसी को कोरोना नहीं हुआ। जबकि बिना टीके वाले संक्रमण की चपेट में आ गए। पूरा लेख इंडियन जर्नल ऑफ एप्लाइड रिसर्च में प्रकाशित हुआ है।
- डॉ. रेणु अग्रवाल, सीएमएस, जिला अस्पताल