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जीटीबी में आरक्षण के खिलाफ याचिका पर फैसला सुरक्षित
Updated Tue, 09 Oct 2018 06:12 AM IST
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जीटीबी में आरक्षण के खिलाफ
याचिका पर फैसला सुरक्षित
- एनजीओ ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फैसले को दी है चुनौती
- 80 फीसदी ओपीडी और बेड दिल्ली वालों के लिए किए हैं आरक्षित
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने जीटीबी अस्पताल में स्थानीय मरीजों को आरक्षण दिए जाने की दिल्ली सरकार की योजना के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर याची व दिल्ली सरकार की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। दिल्ली सरकार ने एक अक्तूबर से जीटीबी अस्पताल में अधिकतर बेड दिल्ली निवासियों के लिए आरक्षित कर दिए थे।
मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन व न्यायमूर्ति वीके राव की खंडपीठ के समक्ष जिरह करते हुए दिल्ली सरकार के स्थायी अधिवक्ता राहुल मेहरा ने कहा कि राजधानी की आबादी करीब 1.9 करोड़ है और यह बहुत तेजी से बढ़ रही है। बढ़ती भीड़ के कारण वर्ष 2016 से डॉक्टरों से लगातार मारपीट हो रही है। कोर्ट भी डॉक्टरों को सुरक्षा देने के लिए कई बार कह चुकी है। इसलिए यह व्यवस्था दिल्ली सरकार ने की है।
दिल्ली सरकार के वकील ने कहा जीटीबी अस्पताल में दिल्ली से बाहर वालों की सभी जांच बंद नहीं की हैं। यहां पर 93 सामान्य व 10 विशेष जांच हो रही हैं। किसी मरीज से भेदभाव नहीं किया जा रहा है। आपातकाल विभाग में भी केस लिए जा रहे हैं। दिल्ली से बाहर के लोगों के लिए 20 फीसदी बेड आरक्षित हैं।
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खंडपीठ ने सोमवार को एक बार फिर पूछा कि फिर यह सर्कुलर क्यों निकाला गया। स्वास्थ्य सेवा तो सबके लिए बराबर होनी चाहिए। दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि दूसरे राज्य भी इस दिशा में काम करें। हम केंद्र सरकार नहीं हैं। हर राज्य की अपनी सीमाएं होती हैं।
दिल्ली सरकार के वकील ने कहा एम्स भी मुफ्त इलाज नहीं देता। अच्छी स्वास्थ्य देने में मेहनत व खर्च आता है। पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में भी इस तरह की योजनाएं चल रही हैं। इन राज्यों में बाहरी व्यक्तियों को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए पैसा देना पड़ता है। कोर्ट ने यह दलील सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
- ये है दिल्ली सरकार की योजना
दिल्ली सरकार ने 1 अक्तूबर से पायलट योजना के तहत जीटीबी अस्पताल में 80 फीसदी ओपीडी और बेड केवल दिल्ली वालों के लिए आरक्षित कर दिए हैं। यही नहीं, अस्पताल में मुफ्त दवाएं और मुफ्त जांच भी केवल दिल्ली वालों की ही होगी। दिल्ली से बाहर के मरीजों के लिए केवल कंसल्टेंसी और इमरजेंसी सेवाएं रखी गई हैं। इस योजना को एनजीओ सोशल ज्यूरिस्ट ने अधिवक्ता अशोक अग्रवाल के जरिए याचिका दायर कर चुनौती दी है।
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याचिका पर फैसला सुरक्षित
- एनजीओ ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फैसले को दी है चुनौती
- 80 फीसदी ओपीडी और बेड दिल्ली वालों के लिए किए हैं आरक्षित
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने जीटीबी अस्पताल में स्थानीय मरीजों को आरक्षण दिए जाने की दिल्ली सरकार की योजना के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर याची व दिल्ली सरकार की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। दिल्ली सरकार ने एक अक्तूबर से जीटीबी अस्पताल में अधिकतर बेड दिल्ली निवासियों के लिए आरक्षित कर दिए थे।
मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन व न्यायमूर्ति वीके राव की खंडपीठ के समक्ष जिरह करते हुए दिल्ली सरकार के स्थायी अधिवक्ता राहुल मेहरा ने कहा कि राजधानी की आबादी करीब 1.9 करोड़ है और यह बहुत तेजी से बढ़ रही है। बढ़ती भीड़ के कारण वर्ष 2016 से डॉक्टरों से लगातार मारपीट हो रही है। कोर्ट भी डॉक्टरों को सुरक्षा देने के लिए कई बार कह चुकी है। इसलिए यह व्यवस्था दिल्ली सरकार ने की है।
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दिल्ली सरकार के वकील ने कहा जीटीबी अस्पताल में दिल्ली से बाहर वालों की सभी जांच बंद नहीं की हैं। यहां पर 93 सामान्य व 10 विशेष जांच हो रही हैं। किसी मरीज से भेदभाव नहीं किया जा रहा है। आपातकाल विभाग में भी केस लिए जा रहे हैं। दिल्ली से बाहर के लोगों के लिए 20 फीसदी बेड आरक्षित हैं।
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खंडपीठ ने सोमवार को एक बार फिर पूछा कि फिर यह सर्कुलर क्यों निकाला गया। स्वास्थ्य सेवा तो सबके लिए बराबर होनी चाहिए। दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि दूसरे राज्य भी इस दिशा में काम करें। हम केंद्र सरकार नहीं हैं। हर राज्य की अपनी सीमाएं होती हैं।
दिल्ली सरकार के वकील ने कहा एम्स भी मुफ्त इलाज नहीं देता। अच्छी स्वास्थ्य देने में मेहनत व खर्च आता है। पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में भी इस तरह की योजनाएं चल रही हैं। इन राज्यों में बाहरी व्यक्तियों को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए पैसा देना पड़ता है। कोर्ट ने यह दलील सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
- ये है दिल्ली सरकार की योजना
दिल्ली सरकार ने 1 अक्तूबर से पायलट योजना के तहत जीटीबी अस्पताल में 80 फीसदी ओपीडी और बेड केवल दिल्ली वालों के लिए आरक्षित कर दिए हैं। यही नहीं, अस्पताल में मुफ्त दवाएं और मुफ्त जांच भी केवल दिल्ली वालों की ही होगी। दिल्ली से बाहर के मरीजों के लिए केवल कंसल्टेंसी और इमरजेंसी सेवाएं रखी गई हैं। इस योजना को एनजीओ सोशल ज्यूरिस्ट ने अधिवक्ता अशोक अग्रवाल के जरिए याचिका दायर कर चुनौती दी है।