{"_id":"5bb14259867a55019f2c9827","slug":"15383434949-ashram-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"निजी अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा करते हैं दिल्ली के सरकारी कर्मचारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
निजी अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा करते हैं दिल्ली के सरकारी कर्मचारी
Updated Mon, 01 Oct 2018 03:08 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दिल्ली के मुलाजिमों को निजी अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा
- हर साल सरकारी कर्मचारियों पर खर्च होने वाला बजट कर रही डेढ़ गुना
- अस्पतालों में तैनात डॉक्टर व कर्मचारी भी पहुंचते हैं निजी अस्पताल
- अस्पतालों में सुविधाएं कम होने का हवाला देकर लेते हैं क्लेम
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। केजरीवाल सरकार बेशक दिल्ली वालों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए तत्पर दिख रही है। लेकिन सच तो यह है कि दिल्ली के कर्मचारियों को निजी अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा हैं। इसलिए हर वर्ष कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य बजट में डेढ़ गुना इजाफा करना पड़ रहा है।
एक आरटीआई से खुलासा हुआ है कि दिल्ली सरकार साल 2010 से अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य बजट में हर वर्ष डेढ़ गुना वृद्धि कर रही है। वर्ष 2016-17 तक यह बजट 130 करोड़ रुपए हो गया। यह सुविधा लेने में अस्पताल कर्मियों के अलावा दिल्ली सरकार में कार्यरत व पूर्व कर्मचारियों, विधायकों, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, निगम पार्षद और आईएएस व आईएफएस भी शामिल हैं। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि दिल्ली के आधे से ज्यादा अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव है।
समाजसेवी हरपाल राणा को आरटीआई से मिले आंकड़ों के अनुसार केवल नौ अस्पतालों के डॉक्टरों और कर्मचारियों के इलाज का आंकड़ा सवा दो करोड़ रुपए के पार है। इसमें सबसे ज्यादा खर्च पूंठ खुर्द स्थित महर्षि वाल्मीकि अस्पताल का है, जो करीब 77 लाख रुपए का है। इसके बाद संजय गांधी अस्पताल में इस मद में बीते वर्ष करीब 50 लाख रुपए खर्च किए गए, जबकि करीब 29 लाख रुपए के खर्च के साथ जग प्रवेश अस्पताल तीसरे नंबर पर है। खास बात यह है कि इस मद में ज्यादा खर्च उन्हीं अस्पतालों में हुआ है जहां सालों भर सुविधाओं का आभाव रहने की खबरें आती रहती हैं।
विज्ञापन
इस पर स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक डॉ. कीर्तिभूषण का कहना है कि राज्य कर्मचारी स्वास्थ्य योजना में दिल्ली के करीब एक लाख कार्यरत अधिकारी व कर्मचारी और करीब 50 लाख रिटायर्ड अधिकारी व कर्मचारी आते हैं। कैंसर, ट्रांसप्लांट, इंप्लांट और सर्जरी में ही ज्यादा खर्च आता है। जबकि आरटीआई कार्यकर्ता का सवाल है कि जब सरकारी कर्मचारियों को ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रहीं तो दिल्ली के करोड़ों लोगों को इसका लाभ कैसे होगा?
विज्ञापन
- हर साल सरकारी कर्मचारियों पर खर्च होने वाला बजट कर रही डेढ़ गुना
- अस्पतालों में तैनात डॉक्टर व कर्मचारी भी पहुंचते हैं निजी अस्पताल
- अस्पतालों में सुविधाएं कम होने का हवाला देकर लेते हैं क्लेम
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। केजरीवाल सरकार बेशक दिल्ली वालों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए तत्पर दिख रही है। लेकिन सच तो यह है कि दिल्ली के कर्मचारियों को निजी अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा हैं। इसलिए हर वर्ष कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य बजट में डेढ़ गुना इजाफा करना पड़ रहा है।
एक आरटीआई से खुलासा हुआ है कि दिल्ली सरकार साल 2010 से अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य बजट में हर वर्ष डेढ़ गुना वृद्धि कर रही है। वर्ष 2016-17 तक यह बजट 130 करोड़ रुपए हो गया। यह सुविधा लेने में अस्पताल कर्मियों के अलावा दिल्ली सरकार में कार्यरत व पूर्व कर्मचारियों, विधायकों, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, निगम पार्षद और आईएएस व आईएफएस भी शामिल हैं। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि दिल्ली के आधे से ज्यादा अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव है।
विज्ञापन
समाजसेवी हरपाल राणा को आरटीआई से मिले आंकड़ों के अनुसार केवल नौ अस्पतालों के डॉक्टरों और कर्मचारियों के इलाज का आंकड़ा सवा दो करोड़ रुपए के पार है। इसमें सबसे ज्यादा खर्च पूंठ खुर्द स्थित महर्षि वाल्मीकि अस्पताल का है, जो करीब 77 लाख रुपए का है। इसके बाद संजय गांधी अस्पताल में इस मद में बीते वर्ष करीब 50 लाख रुपए खर्च किए गए, जबकि करीब 29 लाख रुपए के खर्च के साथ जग प्रवेश अस्पताल तीसरे नंबर पर है। खास बात यह है कि इस मद में ज्यादा खर्च उन्हीं अस्पतालों में हुआ है जहां सालों भर सुविधाओं का आभाव रहने की खबरें आती रहती हैं।
विज्ञापन
इस पर स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक डॉ. कीर्तिभूषण का कहना है कि राज्य कर्मचारी स्वास्थ्य योजना में दिल्ली के करीब एक लाख कार्यरत अधिकारी व कर्मचारी और करीब 50 लाख रिटायर्ड अधिकारी व कर्मचारी आते हैं। कैंसर, ट्रांसप्लांट, इंप्लांट और सर्जरी में ही ज्यादा खर्च आता है। जबकि आरटीआई कार्यकर्ता का सवाल है कि जब सरकारी कर्मचारियों को ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रहीं तो दिल्ली के करोड़ों लोगों को इसका लाभ कैसे होगा?