नोबेल विजेता सत्यार्थी का EXCLUSIVE इंटरव्यू
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शांति के लिए कैलाश सत्यार्थी को मिले नोबेल पुरस्कार की घोषणा के साथ ही एल-6, कालका जी स्थित बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यालय पर देश-विदेश की मीडिया का मेला लग गया। घंटों इंतजार के बाद कुछ पत्रकार कैलाश से बातचीत करने में सफल रहे। बाल मजदूरों की जिंदगी बदलने वाले कैलाश ने अमर उजाला से यूं खुद को बयां किया...
सवाल: भारत-पाकिस्तान को शांति के लिए यह नोबेल पुरस्कार उस समय पर मिला है, जब दोनों में गोलाबारी जारी है। आप इसे किस नजरिए से देखते हैं?
जवाब: पुरस्कार भारत-पाकिस्तान के लिए अहम है और दोनों ही देशों के नागरिकों के लिए यह गर्व का विषय है। पाकिस्तान में भी बाल श्रम को लेकर हमने काफी काम किया है। यह संयुक्त पुरस्कार दोनों देशों के बीच शांति लाने का भी काम करेगा।
सवाल: बाल मजदूरों के खिलाफ काम करने की प्रेरणा कहां से मिली?
जवाब: मैं छह या सात साल का था। विदिशा में जब स्कूल जाता था तो अपनी ही उम्र के बच्चे को ढाबे में काम करता देखता था। उसके पिता के पास गया तो उनका कहना था कि गरीब तो काम करने के लिए ही पैदा होता है। मैंने अपने प्रिंसिपल व अध्यापक से बात की, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। तभी मैंने तय कर लिया कि एक समय पर बाल श्रम के खिलाफ काम करूंगा।
किसे समर्पित करेंगे यह पुरस्कार?
सवाल: 80 हजार बाल श्रमिकों को मुक्त कराकर उन्हें मुख्य धारा में लाने का काम कितना मुश्किल रहा?
उत्तर: तीन दशक पहले हमने भारत में बाल मजदूरी के खिलाफ काम शुरू किया था। धीरे-धीरे यह मुद्दा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बन गया, इसलिए ही यह महसूस करता हूं कि पुरस्कार 125 करोड़ भारतीयों व गुलामी की जंजीरों में जकड़े बच्चों का सम्मान है। अब विश्व के 17 करोड़ बच्चों की मुक्ति के लिए आगे काम बढ़ाने की मेरी जिम्मेदारी बढ़ गई है।
सवाल: यह पुरस्कार किसे समर्पित करेंगे?
जवाब: यह पुरस्कार विश्व के उन बच्चों को समर्पित है, जिनकी पहचान बाल श्रमिकों के रूप में होती है। 144 देशों में बचपन बचाओ आंदोलन इस बुराई के खिलाफ काम कर रहा है।
सवाल: क्या गरीब व निरक्षरता बाल श्रम का मूल कारण है?
जवाब: बिल्कुल, गरीबी व निरक्षरता ही बाल श्रम का बड़ा कारण है। पुरस्कार मिलने से अब संभव है कि बाल श्रम के लिए सरकार कुछ करे।
सवाल: आप प्रधानमंत्री से मिलने जा रहे हैं?
जवाब: हंसते हुए बोले, अभी तक तो ऐसी सूचना मुझे नहीं है। ऊपर व नीचे मीडिया की भीड़ के बीच बाहर आना ही मुश्किल हो रहा है।