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तेंदुए के नहीं दिख रहे निशान: वन विभाग के अधिकारियों और विशेषज्ञों की राय, अपने आशियाने में लौटा तेंदुआ

Tue, 05 Dec 2023 06:08 AM IST
विजय पुंडीर आशीष सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली
आशीष सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विजय पुंडीर Updated Tue, 05 Dec 2023 06:08 AM IST
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No signs of leopard were seen in Sainik Farm even on Monday
सैनिक फॉर्म में दिखा तेंदुआ - फोटो : अमर उजाला

सैनिक फार्म में सोमवार को भी तेंदुए के निशान नहीं दिखे। ऐसे में वन्य विभाग के अधिकारियों और विशेषज्ञों की राय है कि तेंदुआ अपने आशियाने में लौट गया होगा। विभाग के अधिकारियों ने बताया कि जंगल में नील गाय, कुत्तों व बिल्लियों की हलचल नजर आई है, लेकिन तेंदुए ने किसी पर भी हमला नहीं किया है। ऐसे में उनका कहना है कि तेंदुए के असोला भाटी वन्यजीव अभ्यारण्य में जाने की संभावना है। वह कहते हैं कि बिग कैट प्रजाति का यह जानवर बहुत शर्मिला होता है, जिससे यह बहुत देर तक रिहायशी इलाके में नहीं रुक सकता है।

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असोला भाटी वन्यजीव अभ्यारण्य में नौ से दस तेंदुओं की गतिविधियां दिखाई दी हैं। दिल्ली के वन और वन्यजीव विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, अभ्यारण्य को छोटे-बड़े स्तनधारियों ने अपना बसेरा बना लिया है। एक अध्ययन की रिपोर्ट में बताया गया कि यहां तेंदुए, लकड़बग्घा, नील गाय व अन्य कई प्रकार के जानवर देखे गए हैं। ये तेंदुए मानव उपस्थित वाली जगह पर सबसे अधिक घूमते पाए गए हैं। यहां बंदरों की संख्या बहुतायत में है। ऐसे में यहां रहने वाले तेंदुओं के लिए यह पसंदीदा भोजन है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यह तेंदुआ खाने की तलाश में बाहर नहीं आया है।

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डीडीए बायो डायवर्सिटी पार्क के वैज्ञानिक प्रभारी डॉ. फैयाज खुदसर ने बताया कि तेंदुआ सामान्य फीडर है। वह छोटे जानवरों को खाकर भी जीवित रह सकता है। यह अभ्यारण्य स्थानीय तेंदुए का घर है। इसके आसपास फार्म हाउस हैं। सर्दी में खाली पड़े प्लॉट में हरियाली बढ़ जाती है जिससे यह नए आशियाने की तलाश में भटकते हुए यहां पहुंच गया होगा।

ठंड में अच्छे घर तलाशते हैं तेंदुए
वन्यजीव अभ्यारण्य में पर्याप्त भोजन मिलने से यहां तेंदुओं की आबादी बढ़ रही है। डॉ. खुदसर ने बताया कि सर्दियों में तेंदुओं की हलचल बढ़ जाती है। इसके पीछे की मुख्य वजह खाली फार्म में घास बढ़ी रहती है और खेतों में फसल कट जाती है, जिससे लोगों की उपस्थिति कम रहती है। ऐसे में वह सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अपने दायरे को बढ़ाते हैं और अच्छे व दूसरे घर की तलाश करते हैं। वह कहते हैं कि असोला भाटी वन्यजीव अभ्यारण्य के अलावा यह तेंदुए यमुना के बाढ़ क्षेत्र को गलियारा बनाते हुए यहां पहुंच जाते हैं।

तनावग्रस्त हो रहे हैं तेंदुए
असल में यह मानव बस्तियां हैं, जिसने वन्य जीवों के कुछ क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लिया है। वन्यजीव विशेषज्ञ सोहेल मदान कहते हैं कि इसके परिणामस्वरूप वन और उसके आसपास के क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं। बड़ी प्रजातियों में शामिल तेंदुए मानव बस्तियों के आसपास भी रह सकते हैं। हालांकि, मानव आबादी तेजी से बढ़ रही है, जिससे तेंदुए तनावग्रस्त हो रहे हैं। अभी तक किसी भी तरह का तेंदुए ने हमला नहीं किया है। वह कहते हैं कि यह समय इनके प्रजनन का होता है, जिससे यह जंगल में नए घर की तलाश करते हैं और अपना दायरा बढ़ाते हैं। अमूमन एक तेंदुए की उम्र 14 से 15 वर्ष की होती है। यह छिपकर ही शिकार करते हैं। मदान ने कहा कि तेंदुआ अपने घर में ही है, लेकिन लोगों को दिख गया, जिससे लोग डर गए हैं। अभ्यारण के आसपास रहने वाली आबादी को तेंदुए के व्यवहार के बारे में जागरूक करना जरूरी है और क्विक रिस्पांस टीम गठित करना जरूरी है।

32.7 वर्ग किलोमीटर में फैला है अभ्यारण्य
असोला भाटी वन्यजीव अभ्यारण्य 32.7 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला है। यह राजस्थान के अलवर में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान से शुरू होता है और हरियाणा के मेवात, फरीदाबाद व गुरुग्राम से गुजरता है। दक्षिणी दिल्ली में यह संगम विहार, छतरपुर, सैनिक फार्म, नेब सराय और फतेहपुर बेरी जैसी घनी आबादी वाली बस्तियों के साथ सीमा साझा करता है। यहां प्रति 100 वर्ग किलोमीटर में 4.5 तेंदुओं का घनत्व है।

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